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प्राकृतिक खेती का मॉडल होगा जिला,4 हजार हे. से शुरुआत:मिट्टी की उर्वरा शक्ति बचाने-बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार की पहल

भारतीय प्राकृतिक खेती के लिए मुजफ्फरपुर जिला पूरे राज्य में मॉडल बनेगा। कृषि विभाग ने इसके लिए जिले का चयन करते हुए प्रारंभ में 4000 हेक्टेयर खेत में प्राकृतिक पद्धति से खेती कराए जाने का लक्ष्य रखा है। आत्मा ने बामेती पटना में 4 मुखिया के साथ किसानों को ट्रेनिंग देनी भी शुरू कर दी है। दरअसल, खेती में रासायनिक खादाें के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की संरचना खराब हाे रही है। मिट्टी का पीएम लगातार बढ़ने से उर्वरा शक्ति कमजोर हो रही, खेत उसर हाे रहे हैं। इसे देखते हुए केंद्र सरकार पुरानी भारतीय पद्धति से खेती काे प्रोत्साहित कर रही है। इस पद्धति से किसान सभी फसलाें की खेती कर सकते हैं।

जिला कृषि अधिकारी शिलाजीत सिंह ने बताया कि भारतीय प्राकृतिक खेती काे पूरे राज्य में बढ़ावा दिया जाएगा। प्रारंभ मुजफ्फरपुर जिले में 4000 हेक्टेयर खेत से हाेगी। इस खेती में जनप्रतिनिधियों से सहयोग लिया जाएगा। आत्मा द्वारा किसानाें काे विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें रासायनिक उर्वरकों के नुकसान व खेती करने के तरीका बताए जाएंगे। बामेती द्वारा पटना में 4 मुखियाें काे प्रशिक्षण दिया गया है।

इस पद्धति से किसान सभी फसलों की कर सकते हैं खेती

प्राकृतिक खेती से हाेनेवाले प्रमुख फायदे

  • .लागत कम हाेगी, आय बढ़ेगी
  • .भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ेगी
  • .भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ेगी
  • .फसल की क्वालिटी बेहतर हाेगी
  • .पानी का वाष्पीकरण कम होगा
  • .जलस्तर भी मेंटेन हाेता जाएगा
  • .मनुष्य में हाेनेवाले राेग कम हाेंगे।

किसानों काे लागत मेंटेन करने काे 3 वर्ष तक प्रति हेक्टेयर 2 हजार

प्राकृतिक खेती का उद्देश्य खेती में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल राेकना है। इस खेती में उत्पादन लागत मेंटेन करने के लिए सरकार किसानों काे 3 वर्ष तक प्रति हेक्टेयर 2 हजार रुपए देगी। इस खेती में गाय के गाेबर, गाे मूत्र, नीम आधारित प्राकृतिक उत्पादों का इस्तेमाल कर क्लस्टर में खेती करनी है। यह खेती खेत, घर में आसानी से मिलनेवाली सामग्री की सहायता से की जाती है। जीवामृत, बीजामृत, आच्छादन, वाफसा व बहुफसली खेती के माध्यम से मिट्टी के जैविक कार्बन व कार्बनिक पदार्थ को बढ़ाया जाता है। कीटों व रोगों के नियंत्रण के लिए पौधों से तैयार होनेवाले उपचारों व नीम से उत्पादित सामान का इस्तेमाल किया जाता है।

इस प्राचीन भारतीय पद्धति की खेती से बीमारियाें का प्रकाेप भी रुकता है
प्राकृतिक खेती प्राचीन भारतीय पद्धति की खेती है। इसमें उन रासायनिक खाद-केमिकल के इस्तेमाल पर भी राेक लगेगी जिनसे तैयार फसलाें काे खानेवालाें में विभिन्न प्रकार के खतरनाक राेगाें का प्रकाेप बढ़ता है। इससे लाेगाें में फैल रहीं बीमारियां नियंत्रित हाेंगी। बल्कि, इस खेती में तैयार हाेनेवाली फसल स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक हाेंगी। यह पद्धति ग्लोबल वार्मिंग के कुप्रभाव काे भी राेकेगी। खाद्य पदार्थाें की गुणवत्ता अच्छी हाेने के साथ फसल भी बेहतर हाेगी। बता दें कि भोजन के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि कृषि-पारिस्थितिकी विश्व की संपूर्ण आबादी को भोजन उपलब्ध कराने में सक्षम है।

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