पूर्णिया जिले के बनमनखी धरहरा स्थित नरसिंह मंदिर में हर साल होली के अवसर पर होलिका दहन किया जाता है, लेकिन कोरोना के कारण होलिका दहन दो वर्षों से बंद था। ऐसे में दो साल बाद गुरुवार रात भव्य रूप से होलिका दहन होने जा रहा। इसके लिए पूरी तैयारी कर ली गई है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस मंदिर में राख से होली मनाने का परंपरा रही है।
बनमनखी के होलिका दहन है ऐतिहासिक
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखें तो होलिका हिरण कश्यप की बहन थी। जो अपने भाई के कहने पर प्रह्लाद को मारना चाहती थी, लेकिन खुद मर गई। इसके बाद से ही होलिका दहन शुरू हुआ। यह बहुत ही कम ही लोग जानते हैं कि जहां पर यह घटना घटी थी वह जगह बिहार के पूर्णिया जिले में स्थित है। मान्यता है कि इस त्योहार को मनाने की शुरुआत बिहार के पूर्णिया जिले से ही हुई थी।

बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी के सिकलीगढ़ धरहरा में आज भी होलिका दहन से जुड़े अवशेष बचे हैं।
दरअसल, बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी के सिकलीगढ़ धरहरा में आज भी होलिका दहन से जुड़े अवशेष बचे हैं। जहां भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए खम्भे से भगवान नरसिंह का अवतार हुआ था और प्रहलाद को बचा लिया गया था। बनमनखी में होलिका दहन महोत्सव धूमधाम से राजकीय महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। आज भी यहां के लोग रंगों से नहीं बल्कि राख से होली खेलते हैं।

यह वही स्थल है जहां होलिका दहन हुआ था और भक्त प्रहलाद बाल बाल बच गए थे।
भक्त प्रहलाद की जगह भस्म हो गई थी होलिका
सिकलीगढ के रहने वाले राकेश कुमार ने बताया कि भगवान विष्णु ने भक्तों के कल्याण के लिए अपने अंश प्रहलाद को असुरराज कीमत पत्नी कयाधु के गर्भ में भेज दिया। जन्म से ही भक्त प्रहलाद विष्णु भक्त था। जिससे हिरण्यकश्यप उसे अपना शत्रु समझने लगा था। अपने पुत्र को खत्म करने के लिए हिरण्य कश्यप ने होलिका के साथ प्रहलाद को अग्नि में जलाने की योजना बनाई। होलिका के पास एक ऐसी चादर थी जिसपर आग का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता था। हिरण्य कश्यप ने अपनी बहन होलिका को वही चादर लपेटकर प्रहलाद को गोद में बैठाकर आग जला दी। तभी वहां मौजूद खम्भे से भगवान नरसिंह का अवतार हुआ। भक्त प्रहलाद बच गए और तेज़ हवा ने होलिका की चादर उड़ा दी। जिससे वो अग्नि में जल गई। यह वही स्थल है जहां होलिका दहन हुआ था और भक्त प्रहलाद बाल बाल बच गए थे। तभी से इस तिथि पर होली मनाई जाती है।

यहां होली के दिन जुटती है लाखों की भीड़।
भगवान नरसिंह जिस खंबा से प्रकट हुए थे वह आज भी मौजूद है
पौराणिक कथाओं के अनुसार यहीं भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए एक खंभे से भगवान नरसिंह ने अवतार लिया था। भगवान नरसिंह के अवतार से जुड़ा खंभा (माणिक्य स्तंभ) आज भी यहां मौजूद है। कहा जाता है कि इसे कई बार तोड़ने का प्रयास किया गया। इससे यह टूटा तो नहीं, लेकिन ये स्तंभ झुक गया। भगवान नरसिंह के इस मनोहारी मंदिर में भगवान ब्रह्मा, विष्णु व शंकर समेत 40 देवताओं की मूर्तियां स्थापित है।
श्रद्धालुओं का कहना है कि यहां सभी मन्नतें पूरी हो जाती है। साथ ही होली के दिन इस मंदिर में धूड़खेल होली खेलने वालों की मुरादें सीधे भगवान नरसिंह के कानों तक पहुंचती है। इस वजह से होली के दिन यहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ होली खेलने और भगवान नरसिंह के दर्शन के लिए जुटती है।



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