गया के नीमचक बथानी अनुमंडल अंतर्गत पत्थरकटी गांव। इस गांव को लोग ‘मूर्ति कलाकारों’ को रूप में भी जानते हैं। पत्थरकटी जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर की दूरी पर है। इस गांव में करीब 200 घर हैं और यहां 300 से ज्यादा मूर्ति बनाने वाले कलाकार रहते हैं। बताया जाता है कि 1720 ईस्वी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पत्थरकटी गांव को बसाया था। यहां के कलाकारों द्वारा बनाई गई मूर्ति विदेश तक जाती है।
लाखों रुपयों की मूर्तियों का करते हैं निर्माण
पत्थरकटी गांव के लोग जो मूर्तियां बनाते हैं उसकी कीमत 20 रुपये से लेकर लाख रुपये तक होती है। मूर्ति बनाने वाले कलाकार रवींद्रनाथ गौड़ बताते हैं कि 1720 ईस्वी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पत्थरकटी गांव को बसाया था और राजस्थान राज्य से उनके पूर्वज कलाकारों को यहां लाया गया था। पत्थरकटी गांव के ही कलाकारों ने विष्णुपद मंदिर निर्माण में लगने वाले ब्लैक ग्रेनाइट के पत्थर का डिजाइन व निर्माण किया था। सबसे पहले मेरे पूर्वज यहां आए थे और उनके द्वारा यहां मूर्ति बनाने का काम शुरू किया गया।

पहाड़ के नीचे जो छोटे- बड़े टुकड़े पत्थर के होते हैं, उसे ही मजदूरों की मदद से लाया जाता है।
पत्थरकटी गांव में सबसे पहले मेरे ही पूर्वजों ने मूर्ति बनाने का काम शुरू किया और धीरे-धीरे पूरे गांव के लोगों को कुशल कारीगर बना दिया।अब यहां मूर्ति बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है। यहां राजस्थान से मंगाए ग्रेनाइट पत्थर से मूर्तियां बनाई जाती हैं। वही लाल पत्थर यूपी के मिर्जापुर से मंगाया जाता है।
यहां भगवान बुद्ध की मूर्तियों से लेकर देवी देवताओं तथा महापुरुषों और आदमकद प्रतिमाओं के अलावे सभी तरह की होती हैं। सबसे ज्यादा डिमांड भगवान बुद्ध की मूर्ति की रहती है।



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