मुजफ्फरपुर: बिहार का लोकपर्व छठ आस्था और विश्वास का प्रतीक है, जो इस बार मुजफ्फरपुर की शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा में भी रंगारंग रूप में मनाया गया. जेल परिसर में प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी छठ पूजा का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें निरुद्ध बंदियों ने पूर्ण निष्ठा से भाग लिया. कारा में कुल 90 महिला एवं पुरुष बंदियों में से 50 महिलाएं और 40 पुरुषों ने व्रत रखकर इस पर्व को जीवंत बनाया. यह आयोजन न केवल धार्मिक उत्साह का प्रतीक बना, बल्कि जेल की ऊंची दीवारों के अंदर भी आस्था की ज्योति जलाने का उदाहरण प्रस्तुत किया.

धार्मिक सौहार्द की अनुपम मिसाल
इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता धार्मिक सौहार्द रही, जहां दो मुस्लिम महिला बंदियों के साथ एक सिख पुरुष बंदी गुरप्रीत सिंह ने भी व्रत रखा. ये बंदी कई वर्षों से निष्ठा और विश्वास के साथ छठ पर्व का पालन कर रहे हैं, जो आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करता है. रविवार की रात सभी व्रतधारियों ने ‘खरना’ का प्रसाद ग्रहण किया, जिसे बाद में समस्त बंदियों के बीच वितरित किया गया. जेल प्रशासन ने सुख-शांति और भाईचारे के प्रतीक के रूप में एक विशेष डाला भी समर्पित किया, जो एकता की भावना को मजबूत करता है.

जेल प्रशासन की मुकम्मल तैयारियां
कारा प्रशासन ने छठ पर्व की तैयारियां पहले से ही शुरू कर दी थीं, ताकि व्रतधारियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो. व्रती महिलाओं को साड़ी, ब्लाउज, साया, लहठी और चुड़ी प्रदान की गई, जबकि पुरुष व्रतियों को धोती, गंजी, गमछा और डाराडोर दिए गए. पूजन सामग्री, फल, पकवान, सुप और मिठाई की पूरी व्यवस्था जेल प्रशासन की ओर से सुनिश्चित की गई. इन प्रयासों से बंदियों में उत्साह का संचार हुआ और पर्व को घरेलू माहौल जैसा बना दिया गया.

कृत्रिम घाट का भक्तिमय सजावट
जेल परिसर में निर्मित कृत्रिम छठ घाट को विशेष रूप से सजाया गया, जिसमें रंगाई-पुताई के साथ फूल-माला, झालर लाइट, केला के पेड़ और रंगीन बलून लगाए गए. पूरा परिसर भक्तिमय माहौल में बदल गया. घाट पर शारदा सिन्हा के भक्ति गीत बजाए गए, जिन्होंने वातावरण को और अधिक दिव्य बना दिया. यह सजावट न केवल दृश्यात्मक आकर्षण प्रदान करती है, बल्कि बंदियों के मन में श्रद्धा की लहर पैदा करती है.

सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान
सुरक्षा और व्यवस्था को प्राथमिकता देते हुए काराधीक्षक के मार्गदर्शन में पांच प्रशिक्षित तैराकों को घाट पर तैनात किया गया. पूरे परिसर में चौकसी बढ़ाने के लिए अतिरिक्त कक्षपाल और पहरेदारों की ड्यूटी लगाई गई. इन उपायों से आयोजन सुचारु रूप से संपन्न हुआ और किसी प्रकार की अनहोनी की आशंका दूर रही. जेल प्रशासन की यह सतर्कता पर्व की पवित्रता को बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुई.
आस्था की रोशनी दीवारों के पार
भक्ति, अनुशासन और सौहार्द से ओतप्रोत यह आयोजन साबित करता है कि आस्था की रोशनी जेल की ऊंची दीवारों के पार भी दिलों को रोशन कर सकती है. बंदियों के चेहरों पर दिखी मुस्कान और एकजुटता समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है. छठ पर्व ने जेल में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया, जो मानवता की जीत का प्रतीक बना. यह उत्सव न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक सद्भावना का संदेशवाहक भी सिद्ध हुआ.


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