पटना: लोक आस्था का चार दिवसीय महापर्व छठ पूजा आज से शुरू हो रहा है. पहले दिन ‘नहाए-खाए’ के साथ यह पर्व आरंभ होता है, जो शुद्धता, संयम और सूर्य उपासना की परंपरा को समर्पित है. इस दिन व्रती स्नान के बाद लौकी-भात (कद्दू-भात) का सेवन करते हैं. यह केवल धार्मिक नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है.

शुद्धता और संयम का पहला दिन
छठ महापर्व की शुरुआत ‘नहाए-खाए’ से होती है, जो शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है. इस दिन व्रती गंगा, नदी या तालाब में स्नान कर शरीर को शुद्ध करते हैं. इसके बाद पूरी पवित्रता के साथ भोजन पकाया जाता है. भोजन पकाते समय घर और रसोई की सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है. लकड़ी या मिट्टी के चूल्हे पर भोजन बनाना पारंपरिक रूप से अनिवार्य माना गया है, क्योंकि यह पर्यावरण के अनुकूल और शुद्धता का प्रतीक होता है.

लौकी-भात खाने का वैज्ञानिक कारण
लोक संस्कृति और छठ पर्व पर शोध करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार हृदय नारायण झा बताते हैं कि छठ महापर्व का वैज्ञानिक आधार बहुत गहरा है. वह बताते हैं कि लौकी में लगभग 95 प्रतिशत तक पानी होता है, जो शरीर में तरल पदार्थ की मात्रा बनाए रखने में मदद करता है. वहीं भात शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है और ठंडक भी देता है. छठ महापर्व में आगे आने वाले 36 घंटे के निर्जला उपवास को देखते हुए शरीर में पानी की पर्याप्त मात्रा बनी रहे, इसलिए नहाए-खाए के दिन लौकी-भात खाना परंपरा बन गई.

शरीर को ऊर्जा और संतुलन देने वाला भोजन
हृदय नारायण झा कहते हैं कि लौकी-भात का संयोजन शरीर में हल्कापन बनाए रखता है और पाचन को दुरुस्त करता है. कई लोग लौकी के साथ चना दाल भी पकाते हैं, जिससे भोजन में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती है. यह शरीर को संतुलित पोषण देता है और आगामी उपवास के लिए आवश्यक ऊर्जा संचित करता है. लौकी में फाइबर और खनिज तत्व मौजूद होते हैं जो शरीर को ठंडा रखते हैं और पानी की कमी होने से बचाते हैं.

मसाले रहित भोजन का महत्व
‘नहाए-खाए’ के दिन बनने वाला भोजन पूरी तरह बिना मसाले का होता है. यह इसलिए ताकि शरीर को किसी भी प्रकार की गर्मी या गैस संबंधी परेशानी न हो. लौकी और भात का यह सरल संयोजन पाचन तंत्र को संतुलित रखता है और शरीर को शुद्ध बनाए रखता है. हृदय नारायण झा के अनुसार, छठ पर्व में शुद्धता सर्वोपरि है, आहार, व्यवहार और विचार तीनों की शुद्धि ही इस पर्व की आत्मा है.
जल और मिट्टी से शुद्धता की परंपरा
नहाए-खाए के दिन स्नान का विशेष महत्व है. नदी, तालाब या गंगाजल से स्नान करके व्रती शरीर की बाहरी शुद्धि करते हैं, वहीं लौकी-भात का सेवन आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है. मिट्टी के चूल्हे पर बनाया गया यह भोजन पर्यावरण से जुड़ाव और लोक परंपरा के सम्मान का प्रतीक है. यही कारण है कि इस दिन लौकी-भात को ‘आस्था का प्रथम प्रसाद’ कहा जाता है.

संध्या और उषा अर्घ्य की तैयारियां जोरों पर
छठ पूजा 27 अक्टूबर को षष्ठी तिथि के साथ अपने चरम पर होगा. पंचांग के अनुसार, षष्ठी तिथि 27 अक्टूबर को सुबह 06:04 बजे शुरू होकर 28 अक्टूबर को सुबह 07:59 बजे तक रहेगी. इस दौरान 27 अक्टूबर को सूर्यास्त के समय संध्या अर्घ्य और 28 अक्टूबर को सूर्योदय के समय उषा अर्घ्य अर्पित किया जाएगा. घाटों पर भक्तों की भीड़, दीपदान, और भव्य आरती के साथ उत्सव की रौनक देखने लायक होगी.



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