MUZAFFARPUR

संतान की दीर्घायु के लिए माताओं का निर्जला उपवास, जानें जितिया व्रत में क्या करें और क्या नहीं

पटना: भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला जितिया व्रत यानी जीवित्पुत्रिका पर्व बिहार की लोक परंपरा में विशेष महत्व रखता है. इस साल यह व्रत 13 से 15 सितंबर तक मनाया जाएगा. आज 13 सितंबर को नहाय-खाय, 14 सितंबर को निर्जला उपवास और 15 सितंबर को पारण होगा. बिहार के मिथिला, मगध और कोसी क्षेत्र से लेकर भोजपुरी अंचल तक यह पर्व बड़े श्रद्धाभाव और सामाजिक उत्साह के साथ मनाया जाता है.

माताओं की आस्था से जुड़ा पर्व

जितिया मुख्यत माताओं का पर्व है. इसमें माताएं अपने संतान, विशेषकर पुत्रों की दीर्घायु, सुख और समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. पटना के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित राजन उपाध्याय बताते हैं कि यह व्रत केवल धार्मिक आस्था का नहीं बल्कि मातृत्व की शक्ति और त्याग का प्रतीक है. वे कहते हैं, “जितिया व्रत माताओं के अडिग संकल्प का उत्सव है. इसमें मां अपनी संतान की सुरक्षा और मंगलकामना के लिए स्वयं के कष्ट को सहकर भी भगवान से प्रार्थना करती हैं. इसीलिए इसे जीवित्पुत्रिका कहा गया है.”

कथा और परंपरा

प्रमुख कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडव पुत्र आभीर जाति के राजा जिमूतवाहन ने अपने जीवन का बलिदान देकर नागकन्या के पुत्र की रक्षा की थी. उनकी त्यागमयी भावना को ही इस व्रत का आधार माना जाता है.

संतान की लंबी आयु की मान्यता

एक अन्य कथा में कहा जाता है कि एक मछुआरिन स्त्री और एक धाय स्त्री ने साथ मिलकर यह व्रत किया था. व्रत का प्रभाव यह हुआ कि मछुआरिन की संतान सुरक्षित रही जबकि धाय स्त्री की संतान अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई. इसी उदाहरण से यह विश्वास गहराया कि जितिया व्रत संतान की लंबी आयु प्रदान करता है.

बिहार में लोकजीवन से जुड़ाव

बिहार में जितिया सिर्फ धार्मिक व्रत नहीं बल्कि सामाजिक उत्सव भी है. इस अवसर पर महिलाएं सामूहिक रूप से नदियों और तालाबों में स्नान करती हैं, एक-दूसरे को जितिया धागा बांधती हैं और लोकगीत गाकर संकल्प को मजबूत करती हैं.

पर्व का समकालीन महत्व

आज जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब भी जितिया पर्व अपनी गहरी जड़ों के कारण कायम है. यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है बल्कि पारिवारिक और सामाजिक बंधन को भी गहरा करता है. ग्रामीण अंचलों में यह पर्व सामुदायिक सद्भाव का प्रतीक है, वहीं शहरी इलाकों में भी महिलाएं संगठित होकर इसे धूमधाम से निभाती हैं.

बिहार की उस सांस्कृतिक धरोहर

जितिया व्रत बिहार की उस सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है जो पीढ़ियों से माताओं के त्याग, प्रेम और विश्वास को आगे बढ़ाती आई है. पंडित राजन उपाध्याय कहते हैं, “जितिया पर्व हमें यह सिखाता है कि सच्ची आस्था केवल अनुष्ठान में नहीं बल्कि मातृत्व की निस्वार्थ भावना में निहित है.”

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.