पटना: बिहार में लंबे इंतजार के बाद अब किराए की कोख यानी सरोगेसी को कानूनी मंजूरी मिल गई है. राज्य सरकार ने सरोगेसी प्रक्रिया की निगरानी और संचालन के लिए दो दर्जन सदस्यीय मॉनिटरिंग बोर्ड का गठन कर दिया है, जिसमें चिकित्सक, एमएलए और महिला समाजसेवी शामिल है. बोर्ड का नाम रखा गया है एआरटी (सहायक प्रजनन तकनीक) एंड सरोगेसी मॉनिटरिंग बोर्ड.

निसंतान दंपतियों के लिए खुशखबरी
सरकार का यह निर्णय उन दंपतियों के लिए राहत लेकर आया है जो संतान सुख की चाह में सालों से जूझ रहे थे. अब प्रक्रिया पूरी करने के लिए उन्हें झारखंड, पश्चिम बंगाल या अन्य राज्यों का रुख नहीं करना पढ़ेगा. इन राज्यों में न केवल खर्च अधिक होता था, बल्कि कानूनी और चिकित्सा जटिलताओं से भी गुजरना पड़ता था. अब बिहार में ही इस पूरी प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और सुरक्षित रूप में पूरा किया जा सकेगा.

क्या होता है सरोगेसी (किराए की कोख)?
बोर्ड के सदस्य और इंदिरा आईवीएफ के प्रमुख एंब्रॉलजिस्ट डॉक्टर दयानिधि ने बताया कि सरोगेसी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कोई महिला किसी अन्य दंपति के लिए गर्भ धारण करती है. वो बच्चे को जन्म देती है. भारत में इसे “किराए की कोख” के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन यह शब्द कई बार नकारात्मक भाव पैदा करता है, इसलिए इसे चिकित्सा जगत में “सरोगेसी” कहा जाता है.

कैसे होती है प्रक्रिया
सरोगेसी की प्रक्रिया में सरोगेट मदर बच्चे की बायोलॉजिकल मां नहीं होती है, बल्कि वह सिर्फ बच्चे को जन्म देती है. इस प्रक्रिया में संतान प्राप्ति को इच्छुक दंपत्ति में पिता का शुक्राणु और माता का अंडाणु लेकर आईवीएफ तकनीक से टेस्ट ट्यूब में निषेचन किया जाता है. निषेचन के बाद भ्रूण को सरोगेट मदर के गर्भाशय में ट्रांसप्लांट किया जाता है.

कौन-कौन है सरोगेसी के लिए योग्य?
डॉ दयानिधि ने बताया कि भारत में सरोगेसी कानून के अनुसार, जब किसी महिला को गर्भधारण में शारीरिक या चिकित्सकीय कठिनाई होती है, तभी वह सरोगेसी के माध्यम से संतान सुख की प्राप्ति कर सकते हैं. सरोगेसी के लिए विवाहित जोड़े में पुरुष की उम्र 26 साल से 55 साल के बीच और महिला की उम्र 23 से 50 साल के बीच होनी चाहिए. इसके अलावा महिला यदि विधवा अथवा तलाकशुदा है तो उसकी उम्र 35 से 50 वर्ष के बीच होनी चाहिए, ऐसी महिलाओं के अंडाणु से स्पर्म के निषेचन के लिए डोनर पुरुष का सहारा लिया जाता है.

कौन-कौन सरोगेसी के लिए योग्य नहीं?
डॉ दयानिधि ने बताया कि वर्तमान कानून के तहत भारत में कुंवारी महिला जो पहले से ना तो शादीशुदा है ना ही विधवा है, वह सरोगेसी के तहत मां बनने के योग्य नहीं है. इसके अलावा लिविंग में रहने वाले जोड़े, समलैंगिक कपल और एकल पुरूष भी सरोगेसी के तहत संतान सुख प्राप्त करने के योग्य नहीं है. वैसे दंपति अथवा विधवा महिला जिन्हें पूर्व से संतान है वह भी सरोगेसी के तहत संतान प्राप्ति के योग्य नहीं है.

क्या कोई विदेशी भारत में आकर सरोगेसी करा सकता है?
डॉ दयानिधि ने बताया कि भारत सरकार ने 2021 में “सरोगेसी कानून” लागू किया, जिसके तहत केवल परोपकारी सरोगेसी को अनुमति दी गई है, जिसमें पैसे का लेन-देन नहीं होता, सिर्फ चिकित्सा खर्च और बीमा की भरपाई की जाती है. इस कानून के तहत भारतीय नागरिक ही सरोगेसी के तहत संतान सुख की प्राप्ति कर सकते हैं.

एक महिला सिर्फ एक बार बन सकती है सरोगेट मदर: डॉ दयानिधि ने बताया कि भारत में सरोगेसी के लिये संतान के इच्छुक दंपत्ति की कोई ब्लड रिलेशन से जुड़ी महिला का सरोगेट मदर होना अनिवार्य है. कुछ विशेष मामलों में ही विशेष अनुमति पर ब्लड रिलेशन से इतर की महिला सरोगेट मदर बन सकती है. कोई महिला सिर्फ एक बार ही किसी के लिए सरोगेट मदर बन सकती है. सरोगेट मदर बनने के लिए महिला का विवाहित अथवा अविवाहित होने जैसी कोई बाध्यता नहीं है. सरोगेट मदर बनने के लिए महिला की उम्र 25 वर्ष से 35 वर्ष के बीच होनी आवश्यक है.

दोनों पक्ष साइन करते हैं कंसेंट फॉर्म
डॉ दयानिधि ने बताया कि सरोगेसी के तहत जन्म के बाद बच्चा इच्छुक दंपति का हो जाता है और माता-पिता के नाम इच्छुक दंपत्ति के नाम पर होते हैं. इसके लिए दोनों पक्ष (इच्छुक दंपत्ति और सरोगेट मदर) कंसेंट फॉर्म साइन करते हैं. जिसमें गर्भधारण की अवधि में इलाज का पूरा खर्च इच्छुक दंपति वहन करते हैं और इसके अतिरिक्त कोई अन्य खर्च सरोगेट मदर को नहीं देते हैं.
क्या है 2021 का कानून
बता दें कि 2021 के कानून के तहत भारत में सरोगेसी का व्यवसायीकरण प्रतिबंधित है और सरोगेसी एक परोपकारी प्रक्रिया है, इसलिए सरोगेट मदर भी इच्छुक दंपति से कोई अतिरिक्त पैसे की डिमांड नहीं कर सकती. कंसेंट फॉर्म में यह सब कुछ होता है जिस पर दोनों की सहमति होती है.
बिहार में सरोगेसी को कानूनी मान्यता से क्या लाभ होगा?
डॉ दयानिधि ने बताया कि भारत सरकार से कानून बनने के बाद राज्यों में सरोगेसी मॉनिटरिंग बोर्ड का गठन जरूरी था. राज्य सरकार और प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने बिहार में मॉनिटरिंग बोर्ड का गठन किया और इसमें उन्हें भी शामिल किया है. उन्होंने बताया कि बोर्ड के गठन से सरोगेसी की प्रक्रिया राज्य में ही पूरी होगी और प्रदेश के लगभग 18 से 20% निसंतान दंपतियों को सरोगेसी के तहत माता-पिता बनने का मौका मिलेगा.
पटना समेत प्रमुख जिलों में अधिकृत क्लीनिक
अब इच्छुक दंपतियों को दूसरे राज्यों में भटकने की आवश्यकता नहीं होगी और पटना समेत प्रमुख जिलों में अधिकृत क्लीनिक और सुविधाएं विकसित होंगी. इससे इच्छुक दंपति की यह प्रक्रिया कम खर्चीली और नियामक निगरानी में होगी. इसके साथ ही राज्य में विशेषीकृत प्रजनन चिकित्सा केंद्रों और IVF क्लीनिकों का भी विस्तार होगा.
सरोगेसी मॉनिटरिंग बोर्ड का क्या होगा काम?
डॉ दयानिधि ने बताया कि सरोगेसी मॉनिटरिंग बोर्ड बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग की देखरेख में काम करेगा. इसमें चिकित्सक, महिला अधिकार कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, कानूनी विशेषज्ञ, सरकारी अधिकारी और चिकित्सकीय संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल हैं. इसके पदेन अध्यक्ष प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री हैं, जबकि स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव की भी अहम भूमिका है. बोर्ड के सदस्य सरोगेट मदर और इच्छुक दंपत्ति की नियम अनुकूल सभी जांच के बाद सरोगेसी की अनुमति के लिए राज्य सरकार को अनुशंसा करेंगे और स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्वीकृति प्राप्त करेंगे


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