मुजफ्फरपुर: आंचलिकता के अद्भुत चितेरे फणीश्वर नाथ रेणु ने धूल-धूसरित व कीचड़ युक्त देहात को हिन्दी साहित्य का चंदन बना दिया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी रेणु की लेखनी आंचिलकता के मिठास वाले शब्दों के साथ पिरोई हुई है। लोकगीत, लोकोक्ति, लोक संस्कृति, लोक भाषा और लोक नायक के साथ रेणु ने आम जनों के संसार को जैसी जीवंतता दी है, वह अप्रतिम है।

नूतन साहित्यकार परिषद कांटी में शुक्रवार को फणीश्वरनाथ रेणु के पुण्यतिथि कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए चंद्रभूषण सिंह चंद्र ने ये बातें कही। साहित्य भवन में चंद्र ने कहा कि रेणु का भाव आम आदमी के प्रति समर्पण व उनकी ज़िंदगी के अनुभवों से प्रेरणा लेकर लिखना था।

उनके साहित्य में आंचलिकता की वास्तविक हलचलें, परिवर्तन, टकराव, तनाव, और विडंबनाओं का उजागर हुआ। रेणु के चरित्र लेखकों के तय किये गए सींखचों में कसे न होकर आजाद तबियत के हैं।

रेणु सामाजिक समस्याओं पर सिर्फ चिंतन ही नहीं करते थे बल्कि उन सामाजिक समस्याओं के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में हिस्सा भी लेते थे और उस आंदोलन के पक्ष में अपनी कलम भी चलाते थे।

रेणु का कथेतर साहित्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। रिपोर्ताज लेखक के रूप में भी उनकी बहुत ख्याति है। नेपाली क्रांति कथा उनका सुप्रसिद्ध रिपोर्ताज संग्रह है। स्वराजलाल ठाकुर ने कहा कि रेणु एक युगबोधी और दूरदर्शी व्यक्ति भी थे।

रेणु आज से पाँच दशक से भी पहले चुनावों में पेड न्यूज और मीडिया-राजनीतिक दल गठजोड़ की बात करते थे। राकेश कुमार राय ने कहा कि रेणु ने अपनी लेखनी के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन में भी भूमिका निभाई थी। कार्यक्रम में अधिवक्ता नीरज शर्मा, रविभूषण सिंह रवि, नंदकिशोर ठाकुर, महेश कुमार,रामेश्वर महतो, रोहित रंजन, मनोज मिश्र आदि थे।



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