विज्ञान की मदद से इंसानों ने कई तरह की खोज कर, अपने जीवन को और बेहतर बनाया है। विज्ञान के जरिए ही आज लोगों ने नई तरह की तकनीकों का आविष्कार किया है। आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस है। भारत की धरती पर कई महान वैज्ञानिकों ने जन्म लिया है और इन महान वैज्ञानिकों की बदौलत ही भारत ने विश्व भर में विज्ञान के क्षेत्र में अपना एक अलग ही ओहदा बनाया हुआ है।nl
बिहार में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। बिहार के प्रतिभाशाली बाल वैज्ञानिकों ने अपने आईडिया से नए डिवाइस का आविष्कार किया है। विज्ञान दिवस के मौके पर जानिए बिहार के बाल वैज्ञानिकों के नायाब शोध के बारे में।

मास्क में सांस लेने के लिए लगाया पंखा
1. स्मार्ट फिल्टर मास्क- पटना के केसरी नगर निवासी प्रत्युष शर्मा ने स्मार्ट फिल्टर मास्क बनाया है। यह मास्क बाजार में मौजूद दूसरे फेस मास्क की तुलना में आरामदायक है। यह मास्क प्रदूषण से तो बचाता ही हैं साथ ही साथ फैक्ट्री में काम करे रहे मजदूरों के लिए उपयोगी है और अस्थमा जैसी बीमारी में भी आराम दिलाता है। यह फेस मास्क बैटरी से चलता है, जिसे पहनने के बाद लोगों को किसी भी तरह का घुटन नहीं महसूस होगा। इस मास्क के अंदर दो तरह के फिल्टर- पहला एक्टीवेटेड कार्बन फिल्टर और दूसरा नीम फिल्टर लगाए गए हैं। एक्टीवेटेड कार्बन फिल्टर पोलूशन को अब्जॉर्ब करता है, वहीं नीम फिल्टर बैक्टीरिया-वायरस को मार देता है।
इस फेस मास्क में एयर फ्लो के लिए दो पंखे लगे हुए हैं। पहले पंखे का इस्तेमाल मास्क के अंदर मौजूद फ्रेश हवा को लेने के लिए किया जाता है। वहीं, दूसरे पंखे का इस्तेमाल हमारे शरीर से रिलीज हुई हवा को बाहर निकालने के लिए किया जाता है। इस फेस मास्क में 1050 mAh LiPo बैटरी के साथ-साथ चार्जिंग मॉड्यूल TP4056 का इस्तेमाल किया गया है, जिसे दोबारा चार्ज किया जा सकता है। एक बार चार्ज होने के बाद यह 6-7 घंटा का बैकअप देता है। इस मास्क को फेस के आकार के हिसाब से सन बोर्ड का इस्तेमाल कर डिजाइन किया गया है ताकि इसे पहनने के बाद किसी तरह का दर्द ना हो।

पक्षियों को मौत के मुंह से बाहर निकालेगा यह डिवाइस
2. ट्यूलिप टरबाइन– पटना के 14 साल के शिवम दुर्गेश ने ट्यूलिप टरबाइन बनाया है। ट्यूलिप टरबाइन एनर्जी पैदा करने वाली मशीन है। इसका मुख्य उद्देश्य विंड मिल यानी की पवन चक्की के ब्लेड से पक्षियों और चमगादड़ों की जो मौत हो रही है उससे उन्हें बचाना है। ट्यूलिप का यहां मतलब बायकॉन्केव शेप है। इसी बायकॉन्केव शेप के कारण पक्षी बड़ी आसानी से बिना ब्लेड से टकराए पास कर सकते हैं।
विंड मिल, विंड एनर्जी के काइनेटिक फोर्सेज को इलेक्ट्रिकल एनर्जी में कन्वर्ट करता है। यह विंड मिल काफी ज्यादा ध्वनि प्रदूषण करता है। गूगल स्कॉलर्स के एक आर्टिकल के मुताबिक ये पता चला है कि विंड मिल के ब्लेड्स में अल्ट्रावायलेट पेंट का इस्तेमाल किया जाता है और पक्षी अल्ट्रावायलेट पेंट को नहीं देख सकते हैं, यह उनका नेचर है। इसी कारण जब वे इसके ऊपर से उड़ते हैं तो ब्लेड को नहीं देख पाते हैं और इसी में फंस कर रह जाते हैं जिसके बाद उनकी मृत्यु हो जाती है।
शिवम ने इस ट्यूलिप टरबाइन को ऐसे कलर का इस्तेमाल कर डिजाइन किया है जिससे पक्षी ब्लेड को आसानी से देख पाएंगे और उससे बचकर निकल जाएंगे। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसे जहां चाहे वहां लगाया जा सकता है। इसे अगर हाईवे के डिवाइडर पर स्थापित किया जाए तो एयर प्रेशर की वजह से इसकी ब्लेड घूमेगी जिससे बिजली भी पैदा होगी और इसमें लगे एयर प्यूरिफाइंग सिस्टम की वजह से हवा को भी साफ किया जा सकता है। इसके अलावा इससे पैदा हुई बिजली की मदद से स्ट्रीट लाइट को भी जलाया जा सकता है।

नारियल के रेशे से बनाई खास तरह की मिट्टी
3. कोको पीट सॉइल- पटना के राजीव नगर निवासी प्रणव सुमन ने किसानों की समस्या को ध्यान में रखते हुए अपनी खुद की मिट्टी तैयार की है। खास बात ये है कि इसे तैयार करने के लिए उन्होंने नारियल की रेशों यानी की कोको पीट का इस्तेमाल किया है। प्रणव ने नारियल की रेशों को धूप में सुखाकर उसका पाउडर तैयार किया। फिर इस खास तरह की मिट्टी में न्यूट्रिएंट्स के लिए प्याज के पील का एक्सट्रैक्ट और मूंगफली के छिलके के पाउडर का इस्तेमाल किया है। इस मिट्टी में नॉर्मल मिट्टी से 4 गुना जल्दी पौधे उगते हैं। उनके इस प्रोजेक्ट से आम मिट्टी में पौधे को लगाने के झंझट को ही खत्म कर दिया है।
इस मिट्टी में उन्होंने धान का पौधा उगाया है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जब धान को एक समय के बाद जड़ सहित उखाड़ के खेत में लगाया जाता है तो उस दौरान कई सारे जड़ बर्बाद हो जाते हैं। चुकी जड़ के बर्बाद होने से उसका हेल्थ डैमेज हो गया है तो वह उस सॉइल नेचर को जल्दी एडॉप्ट नहीं कर पाता है। यह मीडिया चुकी बहुत ही सॉफ्ट है, इसलिए जब इसमें धान के पौधे लगाए जाते हैं तो अपरूटिंग यानी जड़ से उखाड़ने के समय न के बराबर जड़ बर्बाद होते हैं। इसके वजह से जब इसे मेन फील्ड में ट्रांसफर किया जाता है तो वह जल्दी उस नेचर को एडॉप्ट करता है और बेहतर साइज और कलर के साथ हेल्थी पौधे पैदा करता है। इस मीडिया से पौधे का न्यूट्रिएंट्स भी बना रहता है।

फल-सब्जियों में केमिकल की मात्रा का लगेगा पता
4. पेस्टिसाइड डिटेक्टर- स्वास्थ्य के लिए जरूरी फल और सब्जियों में कितना केमिकल रहता है इसका पता लगाना अब आसान हो गया है। पटना के 16 वर्षीय हर्ष राजपूत और अमित कुमार ने एक पेस्टिसाइड डिटेक्टर डिवाइस तैयार किया है, जिसकी मदद से फलों और सब्जियों में मौजूद केमिकल के मात्रा की जांच की जा सकती है। इस डिवाइस को पावर देने के लिए फिलहाल लैपटॉप, पावर बैंक या फिर मोबाइल एडैप्टर का यूज किया जा रहा है।
यह डिवाइस एनडीवीआइ टेक्नोलॉजी पर बना हुआ है, जिसमें इंफ्रा रेड और रेड एलइडी का इस्तेमाल किया गया है। इस डिवाइस में एक सेंसर लगा है, जिसके सामने कोई भी फल या सब्जी को रख दिया जाता है। एलइडी से प्रकाश को फल पर दिया जाता है और फल से परावर्तित किरणें एलडीआर द्वारा प्राप्त की जाती है। वहीं, एलडीआर से मिलने वाले आउटपुट सामने बने स्क्रीन पर एक वैल्यू के रूप में दिखाई देती है। ये वैल्यू दिखने में लगभग 10-15 सेकेंड का समय लगता है। फिर इस वैल्यू को स्केल से मिलाया जाता है।



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