पटना की मेयर और डिप्टी मेयर के साथ 75 वार्ड पार्षदों का शपथ ग्रहण हिंदी भवन में हो गया है। शपथ का समय सुबह 11 बजे निर्धारित किया गया था। हालांकि पटना की नवनिर्वाचित मेयर सीता साहु सुबह 11:30 बजे के करीब पहुंची। डिप्टी मेयर रेशमी चंद्रवंशी समय से पहुंच चुकी थीं। DM चंद्रशेखर सिंह पहले से मौजूद रहे।n
बता दें कि सीता साहू ने एक बार फिर से मेयर पथ की शपथ ली, जबकि डिप्टी मेयर के रुप में रेशमी चंद्रवंशी ने पहली बार शपथ ली। हालांकि निगम का चुनाव पार्टी के झंडे के साथ नहीं लड़ा गया लेकिन दोनों भाजपा समर्थित उम्मीदवार थीं।

शपथ लेने आईं वार्ड-21 की पार्षद श्वेता रंजन।

डिप्टी मेयर के तौर पर शपथ लेने आईं रेशमी चंद्रवंशी।
इस बार की जीत पहले के चुनावों से इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पहली बार जनता ने सीधे मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव किया है। इससे पहले जनता सिर्फ वार्ड पार्षदों का चुनाव करती थी और वार्ड पार्षद ही मेयर व डिप्टी मेयर चुनते थे। इसमें पर्दे के पीछे से कई तरह के खेल होते थे और बीच में ही पद से हटने का खतरा भी बना रहता था।

बिहार में सरकारी कार्यक्रमों में प्लास्टिक बोतलबंद पानी चलाने की मनाही है। लेकिन शपथ ग्रहण समारोह में चलाया जा रहा है।
दिलचस्प थी मेयर की चुनावी लड़ाई
इस बार पूर्व मेयर सीता साहु ने पूर्व मेयर अफजल इमाम की पत्नी डॉ. महजबी को हराया है। राजधानी पटना के चारों विधानसभा और दोनों लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। इसलिए भी पटना महानगर के चुनाव में मेयर की सीट भाजपा के लिए प्रतिष्ठा से जुड़ गया था। डॉ. महजबी राजद समर्थित थीं, लेकिन वे हार गई। सीता साहू को 1 लाख 1137 वोट मिले, जबकि डॉ महजबीं को 55 हजार 84 वोट मिले हैं।
पटना नगर निगम का चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण है। यह बिहार का सबसे बड़ा नगर निगम है। यहां 75 वार्ड हैं। पटना बिहार की राजधानी है और यहां राज्यपाल, मुख्यमंत्री से लेकर बाकी सभी मंत्रियों के कार्यालय आवास हैं। यहां हाईकोर्ट है। पटना अब मेट्रो सिटी की ओर बढ़ रहा है। यहां मेयर पद के लिए 32 उम्मीदवार मैदान में थे और यह शुरू से साफ था कि सीता साहू का सीधा मुकाबला अफजल इमाम की पत्नी डॉ. महजबीं से होने वाला है।
एक तरफ सीता साहु का चेहरा जहां काफी लोगों के लिए जाना-पहचाना था, तो दूसरी तरफ डॉ. महजबीं उतनी पॉपुलर नहीं थीं। हालांकि मुसलमानों ने एकजुटता के साथ डॉ. महजबी को वोट किया और दूसरी तरफ कई उम्मीदवार खड़े होने के बावजूद हिंदू वोटर्स का इतना वोट नहीं कटा कि सीता साहु हार जातीं। इस मायने में सीता साहु की जीत बड़ी है।



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