कांग्रेस बांका के मंदार से 5 जनवरी को बिहार में भारत जोड़ो यात्रा निकाल रही। मंदार का महत्व यह है कि मंदार पर्वत को समुद्र मंथन के समय मथनी के रूप में देवताओं और राक्षसों ने इस्तेमाल किया था। इसमें जो अमृत मिला उसका पान देवताओं ने किया और छल से विष दैत्यों को दे दिया था। ऐसा लगता है बिहार कांग्रेस अमृत की खोज में मंदार जा रही। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे भी इस कार्यक्रम में आ रहे। हालांकि बिहार कांग्रेस नई जोश वाली कांग्रेस है जिसके नए प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह हैं। लेकिन कांग्रेस की राह में कई तरह के कांटे हैं।
एक सांसद, 19 विधायक, चार पार्षद
बिहार में कांग्रेस के 19 विधायक हैं। पार्टी ने 70 सीटों पर विधान सभा का चुनाव लड़ा था। महागठबंधन की सरकार जब नहीं बन पाई तो सारा ठीकरा कांग्रेस पर फूटा। आरजेडी की तरफ से तेजस्वी का नाराजगी विधान सभा चुनाव के बाद हुए सभी विधान सभा उपचुनाव में दिखता रहा। बहरहाल कांग्रेस बिहार मंत्रिमंडल में शामिल है। इसके दो विधायक आफाक आलम और मुरारी गौतम नीतीश-तेजस्वी सरकार में मंत्री हैं। पार्टी के चार एमएलसी हैं डॉ. मदन मोहन झा, प्रेमचंद मिश्रा, समीर सिंह और राजीव कुमार हैं। एक सांसद हैं मो. जावेद।
बिहार कांग्रेस की चुनौतियां
- बिहार में 1990 के बाद से कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई। मंडल और कमंडल की राजनीति के बीच कांग्रेस का स्पेस घटता गया। जातीय राजनीति का जैसे चरम युग आया उसमें कांग्रेस पिछड़ गई। धर्म की राजनीति भी जैसे परवान चढ़ी उसमें भी कांग्रेस कमजोर हुई।
- लीडरशिप डेवलपमेंट की कमी बिहार कांग्रेस में इसलिए दिखी कि आलाकमान ही सब कुछ तय करता रहा। आलाकमान कल्चर का फायदा कम नुकसान अधिक हुआ। दूसरी तरफ नीतीश कुमार और लालू प्रसाद जैसे नायक बिहार में थे जो बड़े फैसले लेते रहे।
- कांग्रेस, लालू प्रसाद का मुंह ताकती रही और इंतजार करती रही कि उसे कितनी सीट चुनाव में लालू प्रसाद देते हैं!
- ग्रास रुट के वर्कर से कांग्रेस नेतृत्व का संपर्क टूट गया! कई जिलों में तो दफ्तर भी दिनों तक नहीं खुलते। कई जगह 15-20 वर्षों से एक ही व्यक्ति अध्यक्ष पद पर बना रहा।
- लंबे समय से गठबंधन की राजनीति की वजह से कई विधान सभा क्षेत्रों में वर्षों से कोई कांग्रेसी चुनाव लड़ा ही नहीं, नतीजा आम कार्यकर्ता निराशा में चले गए या पार्टी बदल दी, या दूसरे कार्यों में लग गए।



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