कुछ दिनों पहले ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख व सांसद बदरूद्दीन अजमल ने एक विवादित बयान में कहा है कि हिंदुओं को अपनी लड़कियों की शादी 18 से 20 साल के बीच कर देनी चाहिए। आबादी बढ़ाने के लिए हिंदुओं को मुस्लिमों का फार्मूला अपनाना चाहिए। विवाद बढ़ने के बाद बदरूद्दीन ने कहा, मैं शर्मिंदा हूं- माफी मांगता हूं।
एक अलग दुनिया है सीमांचल की। सिसकती-रेंगती सी जिंदगी है। मुस्लिमों के रिकार्ड जनसंख्या वाले इस इलाके में मुख्यतया कुल्हैया और सुरजापुरी बिरादरी के लोग हैं। दोनों ही समुदाय से नेताओं को सत्ता का आशीर्वाद भी खूब मिला है। इन्हीं के वोट के सहारे प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक राजनीति बुलंद होती रही है। केंद्रीय गृहराज्यमंत्री रहे तस्लीमउद्दीन भी इसी क्षेत्र से रहे। तमाम लोग इसी समुदाय से सूबे में भी मंत्री रहे। लेकिन विडंबना यह कि ये समुदाय आज भी बेसहारा ही रह गया। न अपना घर है और न अपना कोई खेत… न सरकार की कोई योजना का यहां कोई अर्थ।
मजदूरी के सहारे ही दो वक्त की रोटी की जुगत में जिंदगी खप जा रही है। गरीबी का आलम ये है कि बेटियां बोझ हैं और जब शादी की उम्र होती है तो कोई अनजाना इनकी गरीबी का फायदा उठाकर उसे दूर देश लेकर चला जाता है। लड़का कौन है… क्या करता है… इतना भी बेटी के मां-बाप नहीं जानते… जानना जरूरी भी नहीं समझते। कहते हैं, दो वक्त की रोटी खाकर जिंदा तो रहेगी… इसी से संतोष कर लेंगे। कई बेटियां वर्षों से वापस नहीं आईं तो कई बस देह बनकर बाजार की होकर रह गईं।
डगरुआ की रईसुल कहती है कि चंदा कर बांकी दो बेटियों की शादी कर लेंगे लेकिन कश्मीर नहीं ब्याहेंगे… कम से कम नजर के सामने तो रहेंगी।
‘गरीबी के कारण बेटियां बोझ’
पूर्णिया के डगरूआ प्रखंड की रइसुल की उम्र 45 साल है। दो बेटियां कश्मीर बसी हैं। कुल चार बेटियां हैं। कहती हैं… जो भी हो अब बाकी बेटियों को कश्मीर नहीं ब्याहेंगे। दस साल पहले सबसे एक बेटी की शादी कश्मीर के एक लड़के से कर दी। आज तक बेटी वापस नहीं आई। एक और बेटी की शादी भी कश्मीरी लड़के से हुई है। लड़का मानसिक तौर पर अपाहिज है और कुछ काम-रोजगार भी नहीं करता। गरीबी की वजह से बेटी की यहां शादी नहीं हो पा रही थी। जिंदगी का दर्द ये है कि रइसुल के पति की उम्र हो चुकी है और बुढ़ापे और बीमारी की वजह से वह कोई काम नहीं कर पा रहे। दो वक्त की रोटी पर भी आफत है।
‘नहीं रहेंगे तो कहां जाएंगे और कौन हमारा भरण पोषण करेगा’
ऐसा ही दर्द अररिया के भंगिया बस्ती के बिलकिस की भी है। दस साल पहले उसके माता-पिता ने गरीबी की वजह से उसकी शादी दोगुने से भी ज्यादा उम्र के अधेड़ मेहद्दीन से कर दी। यूपी के रहने वाला मेहद्दीन ने बिलकिस को नौकरानी बनाकर रखा। बिलकिस बताती है कि पिता के विकलांग व घर की माली हालत खराब होने की वजह से उसे सब चुपचाप सहना पड़ता है। वह सिसकती रही लेकिन किससे कहती… क्या कहती। बिलकिस ने बताया कि यह उसके पति की दूसरी शादी है। उसकी पहली पत्नी मर चुकी थी। कहती है, जिस हाल में भी हैं ससुराल में रहना तो मजबूरी है। नहीं रहेंगे तो कहां जाएंगे और कौन हमारा भरण पोषण करेगा।


बिलकिस बताती हैं कि भंगिया बस्ती की भी कई बेटियां यूपी, हरियाणा व अन्य हिस्सों में अनजान के साथ ब्याही गई हैं।
किशनगंज के कोचाधामन इलाके के मजगामा गांव की एक नाबालिग की शादी गरीबी की वजह से मात्र 16 साल में अफाक नामक युवक से करा दी गई। अफाक की पहले से पांच बीबियां थीं और वह दोगुनी उम्र का था। अफाक देह का दलाल था। चंडीगढ़ के मनीमाजरा में इस पत्नी को भी इसने देह व्यापार में डाल दिया। पहले की पांच बीबियों से भी अफाक धंधा करवाता था। जब इस मासूम ने विरोध किया तो अफाक रूम में बंद कर तेज आवाज में डीजे बजाकर उसकी बुरी तरह पिटाई किया करता था। मुख्य वजह गरीबी से पैदा हुई मजबूरी जिसमें दर्द के बाद भी सिर्फ कराह व सिसकियां थीं। भास्कर से बातचीत में बताया कि उसके जैसी इस क्षेत्र की तमाम बेटियां हैं जो जिस्म बेचने को मजबूर हैं। शादी के बहाने वहां ले जाकर धंधा करवाया जाता है। सैकड़ों बेटियां बेबस हैं। निकलना चाहती हैं लेकिन कहती हैं, यहां से निकलकर भी क्या करेंगे? बेटियां कहती हैं, जिस्म बेचकर भी जिंदा तो हैं। यहां से कहां जाएंगे- क्या करेंगे?
किशनगंज के कोचाधामन की नाबालिग को देह व्यापार में धकेला गया और मना करने पर मारपीट की गई।

क्या कहती है नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट
2015-16 में मुस्लिम महिला प्रजनन दर 3.10 था वहीं 2019-21 यह 2.66 रहा। इसका निष्कर्ष यही है कि मुस्लिमों के प्रजनन दर में कमी तो आई है लेकिन यह अन्य धर्मों की अपेक्षा में काफी कम है। अब भी यह डेटा औसत से अधिक है। अगर ओवरऑल यह आंकड़ा 2.1 या इससे कम हो जाए तो ऐसा माना जाता है कि देश की आबादी कुछ समय के लिए बढ़नी बंद हो जाएगी। मुस्लिम को छोड़कर अन्य सभी 2.1 के रेंज में आ चुके हैं।
आखिर ये आंकड़े क्या कहते हैं?
90 प्रतिशत से ज्यादा जहां मुस्लिम आबादी है वहां 15-19 साल के लड़कियों के गर्भवती होने की संख्या काफी कम है। वहीं 50 प्रतिशत से कम जहां मुस्लिम आबादी है वहां 15-19 साल के लड़कियों के गर्भवती होने की संख्या काफी ज्यादा है।



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