बक्सर में विश्व प्रसिद्ध पंचकोशी परिक्रमा मेले की एक अनोखी परम्परा सदियों से चली आ रही है। यहां संतान प्राप्ति महिलाएं आंचल पर लौंडा डांस कराती हैं। इस मेले का इंतजार लौण्डा टीम को हमेशा रहता है। बक्सर के आहिरौली जिसका नाम यहां अहिल्या माता के मंदिर के नाम पर रखा गया है। यहां पंचकोशी यात्रा लाखों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालु द्वारा दीप जलाने के साथ ही प्रारम्भ होता है। इसको लेकर आज यहां मेले का आयोजन किया गया है। कल का पड़ाव नारद भगवान की तपोस्थली नदाव में होगा। वहां भी मेले का आयोजन करने के लिए पहले से ही लोग पहुंचे हुए है।
इस संबंध में बक्सर पंचकोशी परिक्रमा समिति संयुक्त सचिव सूबेदार पांडेय ने बताया कि ‘ऐसी मान्यता है कि इस यात्रा में शामिल होने और पूजा पाठ कराने से जिन दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति नहीं होती है। वे यहां संतान प्राप्ति की मन्नत मांगते हैं। और जब मन्नतें पूरी होती है तो यहां आंचल पर डांस कराया जाता है। इसे यहां के भाषा में लौंडा नाच कहा जाता है। मांगी हुई मुराद पूरी होने के बाद लोग अपनी संतान के साथ आते हैं। और आंचल फैलाकर लौंडा के गोद में बच्चा देकर डांस के जरिए भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो आज भी जारी है।
आहिरौली निवासी भरत गोंड ने कहा कि लौण्डा नाच का कार्य पांच पुश्तो से चला आ रहा है। आगे भी हमारी पीढ़ी इस लौण्डा नाच को आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि आंचल पर नाचने की कोई कीमत नही मांगी जाती है। श्रद्धालु खुशी से एक हजार,पांच सौ जो भी दे देते है। उसे हमारी टीम रख लेती है।
सोमवार को यह यात्रा श्री नारद जी की तपोस्थली नदांव पहुंचेगी जहां सत्तू-मूली का प्रसाद ग्रहण करेंगे। मंगलवार को ऋषि भार्गव आश्रम भभुअर में दही चूड़ा, बुधवार को छोटका नुआंव स्थित महर्षि उद्यालक आश्रम में खिचड़ी-चोखा का प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है।पांचवें दिन गुरुवार को यात्रा चरित्रवन में पहुंचेगी जहां लिट्टी चोखा का प्रसाद ग्रहण किया जाएगा।जिसमे UP-बिहार के कई जिले के लोग पहुंच यह प्रसाद स्वयं स्थल पर बनाते है।



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