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नवरात्रि में इस मंदिर में महिलाओं की एंट्री बैन:नालंदा के मां आशापुरी मंदिर में होती है तांत्रिक पूजा; बलि की भी परंपरा

नवरात्रि में देवी के नौ रूप की पूजा की जाती है। नालंदा में एक ऐसा भी मंदिर है, जहां मां की पूजा मंदिर में महिलाएं नहीं कर पाती है। दरअसल, नवरात्रि के नौ दिन तक मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक रहती है।

महिलाएं मंदिर के बाहर सीढ़ियों पर ही मां की पूजा करती हैं। यह परंपरा मां आशापुरी मंदिर की है, जो पिछले कई सालों से चली आ रही है। शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिर के अंदर पुरुष जा सकते हैं लेकिन महिलाएं नहीं।

कैसे पहुंचे मां आशापुरी के दरबार
मां आशापुरी के दरबार पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को बिहार शरीफ मुख्यालय आना होगा। यहां से लोकल सवारी गाड़ी पकड़कर या गाड़ी बुक कर 17 किलोमीटर का सफर तय कर पावापुरी के रास्ते श्रद्धालु मां के दरबार में पहुंच सकते हैं। ट्रेन से आने पर नजदीकी रेलवे स्टेशन पावापुरी रेलवे हॉल्ट है, जहां से मां आशापुरी मंदिर जाया जा सकता हैं।

क्या है मंदिर में मान्यता
मंदिर के पुजारी पुरेंद्र उपाध्याय बताते हैं कि नवरात्रि के मौके पर मां आशापुरी मंदिर में विशेष तांत्रिक विधि से पूजा की जाती है। इसी कारण से महिलाओं का प्रवेश मंदिर परिसर और गर्भगृह में वर्जित रहता है।

पुरुषों के लिए भी गर्भगृह में जाने की पाबंदी है लेकिन मंदिर परिसर में पूजा अर्चना कर सकते हैं। सैकड़ों साल से चली आ रही परंपरा का लोग आज भी निर्वहन कर रहे हैं। नवरात्रि के मौके पर यहां तांत्रिक सिद्धि करते हैं।

मंदिर में अति प्राचीन पालकालीन अष्टभुजी मां आशापुरी की प्रतिमा स्थापित है।

मंदिर में अति प्राचीन पालकालीन अष्टभुजी मां आशापुरी की प्रतिमा स्थापित है।

पाल-कालीन मंदिर में अष्टभुजी मां की प्रतिमा

इस मंदिर के गर्भगृह में अति प्राचीन पाल कालीन मां आशापुरी अष्टभुजा प्रतिमा है। इसकी स्थापना मगध साम्राज्य के पाल काल की मानी जाती है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, यहां सबसे पहले राजा घोष ने पूजा की थी। तब यह एक गढ़ हुआ करता था। उसी गढ़ में मां का मंदिर बना हुआ है। राजा घोष के कारण ही गांव का नाम घोसरावां रखा गया।

आसाथान के नाम से भी जाना जाता है
मां आशापुरी मंदिर को आसाथान के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि नालंदा विश्वविद्यालय के छात्र बौद्ध धर्म के अनुयायी यहां पर आकर पढ़ाई करते थे और मां के दरबार में पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लेते थे। इसके बाद उनकी सारी मुरादें पूरी होती थी।

मां को भोग के रूप में नारियल और बताशा भी चढ़ाया जाता है।

मां को भोग के रूप में नारियल और बताशा भी चढ़ाया जाता है।

मनोकामना पूर्ण होने पर बलि देने की है प्रथा
मां आशापुरी के दरबार में श्रद्धालु संतान प्राप्ति को लेकर दूर-दूर से आते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर यहां बकरे की बलि देने की परंपरा है। इसके अलावा मां को भोग के रूप में नारियल और बताशा भी चढ़ाया जाता है।

बिहार शरीफ मुख्यालय से सफर तय कर पावापुरी के रास्ते श्रद्धालु मंदिर में आ सकते हैं।

बिहार शरीफ मुख्यालय से सफर तय कर पावापुरी के रास्ते श्रद्धालु मंदिर में आ सकते हैं।

मंदिर में नवरात्र के दौरान महिलाओं के प्रवेश वर्जित रहने की परंपरा 2500 सालों से चली आ रही हैं। इसका निर्वहन आज भी किया जाता है। इस परंपरा की शुरुआत की वजह क्या थी, इस संबंध में कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। आशापुरी मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में हुआ था। मध्य प्रदेश के राजा यशोवर्मन ने इसका निर्माण कराया था। हालांकि, पुराने मंदिर के निर्माण की तिथि के बारे में कोई साक्ष्य वर्तमान में नहीं है। 9वीं शताब्दी में मगध सम्राट देवपाल मां के दरबार में पधारे थे।

पुरानी परंपरा को निभा रहे: पुजारी

तांत्रिक विधि से मंदिर में पूजा क्यों होती है, इसके बारे में किसी के पास कोई पुख्ता जवाब नहीं है। लेकिन, मंदिर के पुजारी पुरेन्द्र उपाध्यक्ष, जनार्दन पांडेय और कोहनलाल उपाध्याय आज भी इस परंपरा को निभा रहे हैं। उनका कहना है कि पहले उनके पूर्वज तांत्रिक विधि से पूजा करते थे। अब वे लोग कर रहे हैं। किस चीज की तंत्र क्रिया होती है, उसे गुप्त रखा गया है। आशापुरी मंदिर में तंत्र विधि से पूजा में महिलाओं के शामिल होने की मनाही है। ऐसा क्यों है, इस बारे में भी मंदिर के पुजारी कुछ भी बताने से इनकार करते हैं। उनका कहना है कि चली आ रही परंपरा के अनुसार ही ऐसा किया जाता है। वहीं, घोसरावां की रहने वाली मनोरमा देवी, सुनीता देवी, गीता देवी व अन्य महिलाएं कहती हैं कि नवरात्र के दौरान मंदिर में जाने की मनाही से अच्छा तो नहीं लगता है। लेकिन, सदियों से चली आ रही परंपरा के निर्वहन के कारण ऐसा होता है। इसके कारण गांव की महिलाएं भी इसका पालन करती हैं।

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