बिहार में आम धारणा है। बाढ़ की पहली खबर मुजफ्फरपुर के औराई से ही आएगी। वही, औराई इस साल सूखे से बेहाल है। बरसात ही नहीं, साल भर पानी में डूबे रहने वाले इलाके की झील से लेकर तालाब-पोखर तक सूख गए हैं। 29 हजार एकड़ में लगी फसलें सूखने लगी है।
कृषि विभाग जितना खेती का रकबा मान रहा था उसमें 3000 एकड़ तो यूं ही परती पड़ा है। रोजी की तलाश में इलाके से हर दिन लोग पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, मुम्बई जा रहे हैं। किसान कर्ज में डूब गए हैं तो मछुआरों से लेकर नाविकों की कमाई भी चौपट है। बड़े किसानों के भी माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। बनौली गांव के किसान रामचंद्र प्रसाद ने 20 एकड़ में धान की फसल लगाई। पटवन, बीज आदि पर ढाई लाख रुपए अब तक खर्च कर चुके हैं। कहते हैं – अपने जीवन में याद नहीं है कि कभी ऐसा सूखा पड़ा हो। बाढ़ नहीं आने पर इतनी बारिश हो जाती थी कि खेती हो जाती थी। कल्याणपुर गांव के सूबेदार पाल ने कर्ज लेकर 15 हजार में 1 बीघा में फसल लगाई। पानी बिना पीली पड़ गई।
बागमती पर बांध से इलाके का स्वरूप बदला: तीन हिस्सों में बंटा औराई
बांध बनने से पहले बागमती नदी में बाढ़ आने पर औराई के पूरे क्षेत्र में पानी फैल जाता था। आवागमन का एकमात्र साधन नाव होती थी। फसल व जान-माल की हानि राेकने के लिए इसका निर्माण हुआ था जिससे इलाका तीन हिस्सों में बंट गया। पर आधा औराई अब भी त्रासदी में है। बारिश न होने से दोनों ओर इलाके सूखे हैं। बांध पर 8 साल से तंबू में रह रहे बभनगामा गांव के मो. साबिद, शोभित सहनी कहते हैं – सब कुछ तो बांध के अंदर है। जमीन चली गई, हर्जाना भी नहीं मिला। खेती भी गई। कर्ज न लें तो क्या करें।
1. दक्षिणी इलाका
बदल गई किस्मत, बढ़ गई है जमीन की कीमत
बांध बनने से दक्षिणी तटबंध के बाहर के गांवों का जीवन स्तर सुधर गया। आवागमन की सुविधा बढ़ी और बाढ़ से निजात मिलने से खेती भी होने लगी है। बाजार विकसित हुए तो जमीन का रेट भी चार-पांच गुना बढ़ गया।
2. भीतरी क्षेत्र
मौत से बदतर 25 हजार किसानों की जिंदगी
बेनीपुर, मधुबन प्रताप, पटोरी, महुआरा, चैनपुर, राघोपुर, तरबन्ना, बाराखुद, बारा बुजुर्ग, बभनगाम, भतुआ आदि डेढ़ दर्जन गांवों की तकरीबन 25 हजार की आबादी बांध के बीच बसी है। लोग बरसात से पहले ही तटबंध पर तंबू तान लेते हैं।
3. उत्तरी इलाका
यहां पड़ रही बाढ़ और सुखाड़ की दोहरी मार
उत्तरी तटबंध के किनारे के ग्रामीण बाढ़-सूखा दोनों से प्रभावित हैं। बागमती का पानी तो नहीं आता लेकिन लखनदेई और मनुषमारा का काला पानी आने पर लोगों का घर पहले जैसा ही डूब जाता है। काले पानी से जमीन भी उसर हो गई है।





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