चिराग पासवान को पितृपक्ष के बाद केंद्रीय मंत्री बनाने की बात आते ही बिहार में हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री और चाचा पशुपति कुमार पारस की पार्टी ने चिराग पासवान पर बड़े आरोप लगाए हैं। पार्टी ने कहा कि चिराग पासवान क्या फैसला लेते हैं? ये पता नहीं, क्योंकि वो खुद असमंजस में हैं। वो इस पार (NDA) जाएं या उस पार (UPA) जाएं की स्थिति में हैं। ऐसे में व्यक्ति का एक्सीडेंट भी हो जाता है।
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रवण अग्रवाल ने कहा कि 2020 के विधानसभा चुनाव में अगर चिराग ने लोजपा को अकेले मैदान में उतारने का फैसला नहीं लिया होता तो रिजल्ट कुछ और ही होता। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होती और जदयू को साथ लिए बगैर राज्य में सरकार बना पाती। श्रवण अग्रवाल ने चिराग पासवान को लेकर भास्कर के सवालों का जवाब दिया।
क्या चिराग पासवान की शर्तें जायज हैं?
जवाब : NDA में शामिल होने पर लोजपा (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान की तरफ से रखी गई शर्तें समझ से बिल्कुल परे है, क्योंकि वो बार-बार कह रहे हैं कि हम किसी गठबंधन में नहीं हैं। इस पर फैसला 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले करेंगे। जबकि उनके प्रवक्ता कहते हैं कि हमने 5 शर्तें रखी हैं। इनमें 95 प्रतिशत मान भी ली गई हैं।
पहले ये जान लेना चाहिए कि शर्तों के आधार पर राजनीति नहीं होती है। चिराग ने तो खुद को बिहार का भावी मुख्यमंत्री घोषित कर रखा है तो वो केंद्र में मंत्री कहां बनेंगे? चिराग पासवान तो पहले अपनी सदस्यता को बचाएं। क्योंकि पार्टी के बंटवारे से पहले लोजपा की तरफ से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को जो लेटर लिखा गया था, उसमें स्पष्ट किया गया था कि संसदीय दल के नेता पशुपति कुमार पारस हैं।
चिराग पासवान को संसदीय दल से हटाया नहीं गया था। NDA के पक्ष में अगर पार्टी कोई व्हिप जारी करती है और चिराग उसके विरोध में जाते हैं तो उनकी सदस्यता चली जाएगी। राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि पार्टी को तो चिराग पासवान ने ही तोड़ा है।
फिलहाल चुनाव आयोग ने तो दोनों पार्टी को अलग नाम और सिंबल दे रखा है न?
जवाब : इसमें कंफ्यूजन है। वो चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला था। आयोग का अंतिम फैसला नहीं है। तारापुर और कुशेश्वर स्थान विधानसभा उप चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। चिराग गए थे आयोग के पास कि हमें दोनों जगहों पर उम्मीदवार चुनाव में उतारना है। इसलिए पार्टी का चुनाव चिन्ह बंगला ही दिया जाए। तब आयोग ने अपना तात्कालिक फैसला दिया था।
हालांकि, उप चुनाव में इन दोनों ही सीटों पर चिराग पासवान की पार्टी हार गई। पासवान वोटर्स ने उन्हें बुरी तरह से नकार दिया। उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। कहीं से भी चिराग पासवान NDA में नहीं है। पशुपति कुमार पारस और राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी पूरी ईमानदारी से NDA के साथ है।
भादो और पितृपक्ष के बाद क्या आपकी पार्टी में टूट होगी?
जवाब : तीन सांसदों के टूटने की बात पूरी तरह से निराधार है। साजिश के तहत चिराग पासवान और उनके समर्थकों ने राष्ट्रीय लोजपा के तीन सांसदों के टूटने की बात को सोशल मीडिया पर फैलाया था, लेकिन हमारे सभी सांसद एकजुट हैं। 2024 में होने वाला लोकसभा का चुनाव हम पूरी मुस्तैदी से भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर लड़ेंगे।
चिराग पासवान हमेशा पार्टी विरोधी काम में लगे रहे। पूर्व केंद्रीय मंत्री और पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान की विचारधारा को कुंद कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विचारधारा को धोखा दिया। 2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में अगर लोजपा अकेले नहीं लड़ती तो भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनती। हो सकता था कि वो अकेले अपने दम पर सरकार बनाती। जदयू की सहायता नहीं लेनी पड़ती। मगर, चिराग पासवन ने अकेले लड़कर राष्ट्रीय जनता दल और महागठबंधन को फायदा पहुंचाया।
सवाल : क्या चिराग पासवान और उनकी पार्टी NDA में शामिल होते हैं तो पशुपति कुमार पारस भी बने रहेंगे?
जवाब : A,B,C और D कोई भी आए, पशुपति कुमार पारस ने सबके सामने ऐलान कर चुके हैं कि जब तक मैं जीवित रहूंगा, NDA में रहूंगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही मैं बना रहूंगा। भतीजा (चिराग पासवान) क्या फैसला लेते हैं? ये पता नहीं। क्योंकि, वो खुद असमंजस में हैं। वो इस पार (NDA) जाएं या उस पार (UPA) जाएं की स्थिति में हैं। ऐसे में व्यक्ति का एक्सीडेंट भी हो जाता है।
चिराग पर फैसला भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और NDA में शामिल पार्टियों का होगा। हालांकि, चिराग पासवान के NDA में आने से गठबंधन को कोई फायदा नहीं होने वाला है। बिहार में विधान परिषद के हुए चुनाव में भी उनकी पार्टी बुरी तरह से हार गई थी। बिहार में दलितों और पासवान का पूरा समर्थन अगर किसी के पास है तो वो पशुपति कुमार पारस हैं।







Leave a Reply