सारण प्रमंडल के मूल निवासी प्रोफेसर जगदीश नारायण सिन्हा, दिल्ली विश्वविद्यालय के सतत प्रयास, लेखन एवं यूनेस्को से पत्राचार के बाद लंगट सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर की वेधशाला अंतर्राष्ट्रीय पटल पर आई है। यूनेस्को की लुप्तप्राय विश्व विरासत की सूची में सम्मिलित होने के कारण बिहार की पहली इस वेधशाला का पुनर्निर्माण होने की आस जगी है। इससे पहले इस काॅलेज नेशनल हेरिटेज का दर्जा प्राप्त हाे चुका है। प्रो. सिन्हा दिल्ली में रहते हुए बिहार की विरासत, गौरव एवं इतिहास पर बीते चार दशक से निरंतर प्रयत्नशील हैं।
खगोलीय वेधशाला मुजफ्फरपुर को हाल ही में दुनिया की महत्वपूर्ण लुप्तप्राय विरासत वेधशालाओं की यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया है। यह वेधशाला 1916 में स्थापित की गई थी और 26 जुलाई 2022 (अपने शताब्दी वर्ष में) को अपने नए भवन में स्थानांतरित कर दी गई।
1916 में हुई थी स्थाापित : 26 जुलाई 2022 को शताब्दी वर्ष में नए भवन में स्थानांतरित हुई
प्राचार्य डाॅ. ओपी राय ने कहा – इस विश्व विरासत काे संजाेने और संवारने के लिए हर तरह से मिल कर प्रयास हाेगा
प्राचार्य डाॅ. ओपी राय ने कहा कि यह गाैरव की बात है कि 5 शिक्षक और 72 छात्राें के छात्राें के साथ 3 जुलाई 1899 में स्थापित यह काॅलेज नित्य नई ऊंचाईयाें काे छू रहा है। इस विरासत काे संजाेने और संवारने के लिए हर तरह से प्रयास जारी है और आगे भी जारी रहेगा। वेदशाला और तारामंडल के जीर्णाेद्धार के लिए राज्य से लेकर केंद्र तक पहल की जा रही है।
स्वतंत्रता तक सक्रिय थी
970 के दशक तक बंद हो गई, देखभाल के अभाव में अब मशीनों का ढांचा ही बचा
विडंबना यह है कि वह स्वतंत्रता तक कार्यात्मक रूप से सबसे अधिक सक्रिय था लेकिन उसके बाद 1970 का दशक आते-आते बंद हो गया। देखभाल के अभाव के कारण अब यहां बिना मशीनों का सिर्फ ढांचा खड़ा है। प्रो. सिन्हा पिछले 30 वर्षों से इस मामले में सभी संबंधित पक्षों का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। फलस्वरूप अब एक नई आस जगी है। उम्मीद है कि यूनेस्को की सूची में शामिल होने के बाद अधिकारी और नागरिक समाज जागृत होगा।







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