कोरोना संक्रमण से 14 दिन में तो मुक्ति मिल गई, लेकिन उसके साइड इफेक्ट से लोग अभी भी परेशान हैं। किसी की आंखों की रोशनी कम हो गई, तो किसी के शरीर में दर्द की शिकायत बनी रहती है। कोरोना के बाद अगर सिर दर्द अक्सर हो रहा हो, तो इसे इग्नोर करने की गलती नहीं करें, क्योंकि ये ब्रेन टीबी हो सकता है।
कोरोना के साइड इफेक्ट में ब्रेन टीबी भी जुड़ गया है। उल्टी, सिर दर्द, थकान की वजह से लोग सिर दर्द की दवा खा रहे हैं। जबकि, समस्या अधिक होने पर अनहोनी की आशंका रहती है। बिहार के अस्पतालों में हर महीने 250 और पटना में 100 से अधिक मरीज आ रहे हैं।
जबकि, कोविड से पहले महीने में 25 से 35 मरीज ब्रेन टीबी के पहुंचते थे। इसके साथ ही चेस्ट टीबी से संक्रमितों की संख्या में इजाफा हुआ है।
बीमारियों में अंतर न होने से इलाज में परेशानी
आईजीआईएमएस के न्यूरो मेडिसिन विभाग के हेड डॉ. अशोक कुमार के मुताबिक, बीमारियों की पहचान के बाद इलाज में आसानी होती है। मेनिनजाइटिस और न्यूरो सिस्टेसाइकोसिस के बीच अंतर के लिए रिसर्च की आवश्यकता है। पंजाब और दिल्ली में आईसीएमआर की मदद से किया जा रहा है। इससे बीमारियों की पहचान के साथ ही इलाज में मदद मिल रही है। मेनिनजाइटिस झिल्लियों को कहते हैं, जो मस्तिष्क की सुरक्षा कवच होती हैं।
झिल्लियों में सूजन आने के चलते मेनिनजाइटिस से संक्रमित व्यक्ति में सिरदर्द, बुखार, उल्टी, त्वचा और होंठ का पीला होना, ठंड लगना आदि लक्षण पाए जाते हैं। जबकि, न्यूरो सिस्टेसाइकोसिस में मानसिक एकाग्रता कमी होती है। न्यूरो फिजिशियन डॉ. विनय कारक का कहना है कि कोविड संक्रमण से ठीक हुए व्यक्तियों को भी मानसिक, शारीरिक बीमारियां हुई हैं। राजवंशी नगर स्थित लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल के न्यूरो विभाग के अनिल कुमार के मुताबिक कोविड के प्रभाव से चेस्ट रोगियों की संख्या में 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
क्या हैं लक्षण और जांच
आईजीआईएमएस के न्यूरो मेडिसिन के हेड अशोक कुमार के मुताबिक, ब्रेन टीबी से पीड़ित को सिरदर्द, उल्टी, थकान, बुखार, गर्दन में अकड़न, सुस्ती, चिड़चिड़ापन, बार-बार बेहोश होने की शिकायत रहती है। ऐसे मरीजों को तत्काल डॉक्टरों से सलाह लेकर इसका पता लगाने के लिए सीएसए, एक्सरे, सीबी नेट, ब्लड टेस्ट, एमआरआई, सिटी स्कैन करवाना चाहिए।
कमजोर इम्युनिटी वाले रोगियों के साथ शराब और सिगरेट पीने वाले मरीजों को सबसे अधिक ब्रेन टीबी का खतरा रहता है। इसके साथ ही फेफड़े के टीबी मरीजों को ब्रेन टीबी का सबसे अधिक खतरा रहता है।







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