यूपीएससी में 146वां रैंक हासिल करने वाले अभिनव ने कहा कि बिहार में सरकारी नौकरी को लेकर गजब का क्रेज है। यह तस्वीर बदलनी चाहिए। वह भले ही यूपीएससी में सफल हो गए हैं, लेकिन उनका युवाओं के लिए एक ही मंत्र है, अपने लिए नौकरी खोजने की बजाए दूसरों को रोजगार देने लायक बनो। कहा कि उन्होंने खुद का स्टार्टअप शुरू किया था। लेकिन, यह बहुत सफल नहीं हो पाया। लॉजिस्टिक एग्रीगेटर की शुरुआत की थी। इसमें छोटे-छोटे दुकानदार अपने सामानों को एक ही प्लेटफॉर्म से ग्राहकों तक पहुंचा पाते। लेकिन, यह आगे नहीं बढ़ सका। तब वे यूपीएससी की तैयारी में जुट गए।
बताया कि इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्टार्टअप आइडिया असफल हो जाए। उन्होंने युवाओं से अपील की है िक जॉब सीकर के बदले जॉब क्रिएटर बनें। अभिनव मीनापुर के टेंगराहां गांव के मूल निवासी हैं। उन्होंने अपने दूसरे प्रयास में यह सफलता पाई है। उनके पिता उमेश्वर सिंह मारवाड़ी हाई स्कूल के शिक्षक थे। मां मीरूबाला सिंह एक गृहिणी हैं। अभिनव ने शुरुआती शिक्षा जीडी मदर इंटरनेशनल स्कूल से पूरी की। उसके बाद उन्होंने आईआईटी रूड़की से बीटेक किया। इंटीग्रेटेड कोर्स किया। 2017 में बीटेक पूरा करने के बाद दो वर्ष की नौकरी बंगलुरू और गुरुग्राम में की। उसके बाद पिछले दो वर्ष से लगातार तैयारी कर रहे हैं। अभिनव दो भाई-दो बहन हैं।
सेल्फ स्टडी से ही उन्होंने मुकाम हासिल कियाअभिनव ने बताया कि पहले वर्ष की तैयारी में उन्होंने कोचिंग का सहारा लिया। कारण कि उनका पढ़ाई से जुड़ाव थोड़ा कम हो गया था। लेकिन, दूसरे वर्ष कोचिंग का सहारा नहीं लेना पड़ा। सेल्फ स्टडी से ही उन्होंने मुकाम हासिल किया है। बताया कि सितंबर 2021 में प्रीलिम्स का आयोजन किया गया था। इसके बाद जनवरी 2022 में मेंस हुआ। उसका इंटरव्यू 22 अप्रैल को हुआ था। यह पूछे जाने पर वे ज्वाइन करेंगे या फिर से परीक्षा देंगे, इस पर अभिनव ने कहा कि अभी कुछ तय नहीं है।
नीरज ने नौकरी के साथ जारी रखी यूपीएससी की तैयारी, छुट्टी पर 14-14 घंटे पढ़ते थे
सरैया प्रखंड के पगहियां निवासी नीरज कुमार ने अपने पहले ही प्रयास में यूपीएससी में 550वां रैंक हासिल किया है। आईआईटी कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे बेंगलुरु में नौकरी के साथ-साथ तैयारी करने लगे। टाइम मैनेजमेंट करना मुश्किल था। लेकिन, यूपीएससी क्रैक करने का सपना जो देखा था, उसके आगे सारी चुनौतियां छोटी थीं। कोरोना के कारण वर्क फ्रॉम होम से समय का सदुपयोग करते हुए तैयारी को आगे बढ़ाया। ऑफिस से शनिवार और रविवार को छुट्टी मिलती थी तो 14-14 घंटे तक पढ़ाई करते थे। समय की बर्बादी नहीं करते थे।
सोशल मीडिया और बेकार के कामों में ध्यान नहीं देते। जब लिखित परीक्षा का परिणाम आया तो जॉब से दो महीने की छुट्टी ले ली। इससे तैयारी में बड़ी मदद मिली। नीरज के पिता शंभू कुमार सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं। बताया कि आर्थिक तंगी के बीच नीरज का जीवन बीता। शुरुआती दौर में उन्होंने प्राइवेट नौकरी करते हुए बच्चों को पढ़ाया। पैसे की कमी आड़े आई, लेकिन बेटों की पढ़ाई में कभी भी इसको वजह नहीं बनने दिया। पिता ने कहा कि बेटा बचपन से ही पढ़ाई में मेहनती था। शुरुआती पढ़ाई गांव में ही हुई। उसके बाद इंटर में वह जिला टॉपर बना था। इसके बाद पहले ही प्रयास में आईआईटी में सफलता पाई।







Comment here