प्रशासन की कार्रवाई के बाद भी प्रखंड क्षेत्र के किसान खेत में पराली जलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। शाम ढलते ही किसान पराली जलाने का कार्य करते हैं। अस्थावां से कुलती जाने के दौरान कई खेत में पराली जलती मिली। रविवार की शाम भी पराली जलाई जा रही थी। स्थानीय ग्रामीणों से बातचीत से पता चला कि वर्ष में दो बार खेतों में पराली जलाई जाती है। अप्रैल में गेहूं एवं सितम्बर के मध्य में धान फ़सल की कटाई के बाद पराली जलाई जाती है। धान फसल की कटाई के तुरंत बाद गेंहू की बुआई करनी होती है। इसके लिए खेत साफ़ होनी चाहिए। तभी आगे की बुआई हो पाएगी। यदि धान फ़सल की पराली को खेत में ही छोड़ दिया जाता है तो उसे गलने में काफ़ी समय लगेगा और उससे दूसरी फ़सल में समस्या आएगी। दूसरा बड़ा कारण है कि कामगारों की कमी के कारण अब कृषि यंत्र के माध्यम से फसल की कटाई होती है। जिससे फसल अवशेष खेतो में ही पड़े रहे जाते है। पहले हाथों से कटाई होने के कारण अवशेष नहीं रहते थे। बचे हुए अवशेष से भूसा बना लिया जाता था। कृषि यंत्र के उपयोग में आने से कृषि कार्य में लगे मवेशियों की संख्या घटी है। जिसके कारण अब भूसे की जरूरत किसानों को महसूस नहीं होती है। इस कारण से भी पराली जलाने की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। हालांकि पराली को बायो कम्पोस्ट के माध्यम से खाद बनाकर खेत में डाला जाए तो यह खेती के लिए अमृत है। इससे अगली फसल बिना बजारू पेस्टिसाइड और खाद के अच्छी हो सकती है। लेकिन कई किसान जानकारी के अभाव में अगली फ़सल के उद्देश्य से इसे जलाकर ख़त्म करना पसंद करते हैं।







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