सीतामढ़ी शहर की स्वच्छता एवं सौन्दर्यीकरण में लक्ष्मना नदी की गंदगी रोड़ा है। इस नदी से न सिर्फ आम आदमी परेशान बल्कि किसानों को भी काफी नुकसान है। सीतामढ़ी जगत जननी माता जानकी की जन्म स्थली को लेकर प्रख्यात है। माना गया है कि सीता माता की जब उत्पत्ति हुई थी तो लक्ष्मणा सहित कई नदियां माता के सहेली के रुप में अवतरित हुई। लेकिन नदी के मृतप्राय, जल अधिग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण और कचरा डंप होने से पवित्र नदी का हाल नाले से भी बदतर हो गई है। यह नदी नेपाल से निकलकर सीतामढ़ी के विभिन्न प्रखंडों से होते हुए सीतामढ़ी शहर से गुजरते हुए मुजफ्फरपुर जिले में प्रवेश करती है
लक्षमणा नदी को पिछले तीन दशक से कल-कल धारा का इंतजार है। नदी की धारा में मिट्टी भराव होने से नेपाल से ही नदी की धारा बंद है और नेपाल से ही रास्ता बदलकर नदी की नई धारा एक किलोमीटर पूरब छोटी भारसर होकर भारत में प्रवेश कर नए क्षेत्र मे तबाही मचा रही है। इस नदी की पुरानी धारा की उड़ाही के लिए हुए लंबे संघर्ष के बाद इसकी उड़ाही कर पुरानी धारा में पानी लाने का काम शुरू हुआ लेकिन यह अब तक यह अंजाम तक नहीं पहुंचा। जिससे यह आज भी यह नदी नाला के रूप में मृत प्राय स्थिति में है। लखनदेई नदी की धारा से न केवल खेतों की सिंचाई, भू -जलस्तर बनाए रखने, मानव तथा पशु के इस्तेमाल के लिए उपयोगी होता था। लेकिन अब इस सुविधा से जहां लोग वंचित हो रहे हैं और पर्यावरण दृष्टिकोण से भी उचित नहीं है।
नदी में गंदे पानी बहाव होने से इसका पानी भी प्रदूषित हो चुका है। वर्ष 2016 में सीएम नीतीश कुमार दुलारपुर घाट आकर योजना का शुभारंभ किया। और इस कार्य के लिए सीएम ने 100 करोड़ रुपए आवंटित किए। लेकिन अब तक दुलारपुर घाट से सीतामढ़ी के बीच 18 किलोमीटर नदी की खुदाई हो चुकी है। करीब सात साल से जमीन अधिग्रहण तथा अधिग्रहित जमीन के मुआवजे की राशि के भुगतान की कार्रवाई में विलंब से दुलारपुर घाट से छोटी भारसर के बीच के तीन किलोमीटर की खुदाई शेष है।



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