अचानक लालू परिवार यानी RJD की इफ्तार पार्टी में शामिल होकर नीतीश कुमार ने एक बार फिर सबको चौंका दिया। हालांकि, अगली सुबह गृहमंत्री अमित शाह को एयरपोर्ट पर रिसीव कर उन्होंने BJP को एहसास कराया कि अभी सब ठीक है, लेकिन आगे के रास्ते खुले हैं।
इस समय देश में पक्ष और विपक्ष दोनों 2024 की बिसात बिछा रहा है। ऐसे में सुशासन बाबू के इस कदम को न साथी हल्के में ले सकते हैं और न विपक्षी। क्योंकि विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव, कमोबेश हर मौके पर वह जिधर रहे, उधर का पलड़ा भारी रहा। इसकी गवाही चुनावी आंकड़े भी दे रहे हैं। पिछले दो दशक से बिहार की राजनीति को अपनी अंगुलियों पर घूमाने वाले नीतीश के अंदर वोट ट्रांसफर कराने की जितनी काबिलियत है, उतना शायद ही राज्य के किसी नेता में है। यही कारण है कि पार्टी कोई भी हो, उनके एक इशारे पर साथ जाने को तैयार हो जाती है।
लोकसभा चुनाव में नीतीश ज्यादा कारगर
विभाजित बिहार के बाद हुए 4 लोकसभा चुनावों के आंकड़ों को देखेंगे तो पाएंगे कि नीतीश कुमार का विधानसभा की तुलना में लोकसभा चुनाव में ट्रैक रिकार्ड ज्यादा बेहतर है। उनका वोट प्रतिशत 2014 लोकसभा चुनाव को छोड़कर कभी 22% से नीचे नहीं रहा है।
वहीं, 2009 में तो कांग्रेस की लहर के बावजूद बिहार में नीतीश के साथ रहने पर NDA 32 सीट जीतने में कामयाब रही थी। हालांकि, उस वक्त अंतिम समय में कांग्रेस ने लालू और रामविलास पासवान के सिर्फ 3 सीट देने पर गठबंधन तोड़ लिया था और अकेले लड़ी थी। इसका फायदा भी उनको हुआ था।
वहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में JDU अकेले लड़ी और 16.04% वोट लाने में कामयाब रही। तब दो सीट मिली थी और मोदी लहर में 36.48% वोट पाकर NDA 31 सीटों पर जीती थी, लेकिन BJP को पता है कि उनको इतनी बड़ी जीत तब मिली थी जब मुकाबला त्रिकोणीय हुआ था। अब नीतीश फिर अकेले लड़ेंगे, ऐसे आसार कम ही है।



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