सीवान के सुल्तान कहे जाने वाले शहाबुद्दीन के निध”न के बाद अब यहां का अगला सुल्तान कौन होगा? ये बड़ा सवाल है। सीवान पर दावेदारी को लेकर लगातार बाहुबलियों के बीच संघर्ष चल रहा है। शहाबुद्दीन की विरासत की जंग शुरू हो चुकी है। शहाबुद्दीन की मौत के 11 महीने बाद ही उनकी जगह कब्जाने के लिए होड़ मची है। इस लड़ाई के तीन मुख्य किरदार हैं, रईस खान, अजय सिंह और ओसामा शहाब
रईस खान कभी शहाबुद्दीन के दाहिने हाथ रहे हैं। वहीं ओसामा शहाब, शहाबुद्दीन के बेटे यानी उनके साम्राज्य के उत्तराधिकारी बनने में लगे हैं। इस बीच अजय सिंह राजनीतिक रूप से बीच का रास्ता निकाला और पत्नी कविता सिंह को सीवान का सांसद बना दिया। फिलहाल राजनीतिक रूप से सीवान पर अजय सिंह का कब्जा है।
रईस पर फायरिंग के बाद सुल्तान बनने की होड़
सीवान के सुल्तान बनने की होड़ सतह पर उस वक्त आ गई, जब रईस खान ने विधान परिषद का चुनाव बतौर निर्दलीय उम्मीदवार लड़ा। 4 अप्रैल की रात को रईस खान के काफिले पर हमला हुआ। रईस का दावा है कि यह हमला एके-47 से हुआ और तकरीबन 150 राउंड गोलियां चलीं। इस हमले में काफिले में पीछे चल रहे एक नौजवान लड़के की मौत हो गई और चार घायल हो गए। इस पूरी घटना के बाद रईस ने सीवान के हुसैनगंज थाने में ओसामा शहाब सहित कुल आठ लोगों पर एफआईआर दर्ज कराई है।
सबसे दिलचस्प बात ये है कि शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने कहा कि उन्होंने अपने पति को खोया और अब दिल्ली में रहने वाले उनके बेटे ओसामा पर एफआईआर की गई। इन हालातों में यदि उन्हें न्याय नहीं मिलता है, तो वह सीवान छोड़ देंगी। बता दें कि हिना शहाब खुद भी सीवान सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ती हैं और हारती रही हैं। शहाबुद्दीन साल 2004 में सांसद चुने गए थे और 2009 में चुनाव आयोग ने उन्हें चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया था। अब उस विरासत पर उनके पुत्र ओसामा शहाब कब्जा जमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अजय सिंह भी कभी शहाबुद्दीन के थे करीबी
कभी शहाबुद्दीन के साथ रहे अजय सिंह भी बदलते वक्त के साथ शहाबुद्दीन के विरोधियों में शामिल हो गए। दरअसल दरौली से अजय सिंह की मां जगमातो देवी चुनाव लड़ती थी। 2011 में उनके निधन के बाद दरौंदा में उपचुनाव था। इसमें अजय सिंह ने अपनी दावेदारी को पेश किया था। राजनीति में ऊंचा कद पाने की ललक में कभी साथ रहने वाले शहाबुद्दीन और अजय सिंह के बीच कालांतर में दूरियां बनती गई।
दरौंदा में होने वाले तबके उपचुनाव को लेकर अजय सिंह ने अपनी दावेदारी पेश की, जिसे तब सीएम नीतीश कुमार द्वारा ठुकरा दिया गया था। अविवाहित रहने वाले अजय सिंह ने पितृपक्ष में ही कविता सिंह से शादी की और कविता सिंह को टिकट मिला। वह पहली बार में ही विधायक चुन ली गईं। बिहार की राजनीति में 2011 से पहले अनजान रही कविता सिंह रातों रात सूबे की सियासत का चर्चित चेहरा बन गईं। 2019 तक विधायक रहने के बाद सीवान की लोकसभा सीट बीजेपी के बदले जदयू के खाते में गई। जदयू ने कविता सिंह पर भरोसा जताया और कविता सिंह ने पहली बार में ही सांसद के रूप में जीत दर्ज कर अपनी पहचान को और पुख्ता कर लिया।
अपराध की दुनिया के खान ब्रदर्स
रईस खान, खान ब्रदर्स की तिकड़ी का एक हिस्सा हैं। सीवान के सिसवन प्रखंड के ग्यासपुर गांव के कमरूल हक के तीन बेटे हैं, अयूब खान, रईस खान और चांद खान। अपराध की दुनिया से अयूब खान और रईस खान का नाता रहा। अयूब खान जिनकी 42 से अधिक मामलों में तलाश थी, उन्हें एसटीएफ ने इसी साल जनवरी में बिहार के मुजफ्फरपुर से गिरफ्तार किया है। दूसरी ओर, निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर रईस खान के हलफनामे में हत्या, अपहरण और अन्य अपराधों के 12 मामलों का जिक्र है।
खान ब्रदर्स की तिकड़ी के तीसरे हिस्से चांद खान का नाम कम ही लिया जाता है। सीवान में लगातार चल रहे इन संघर्षों को देखने वाले मानते हैं कि खान परिवार, चांद खान के जरिए राजनीति करना चाहता था। इसीलिए चांद खान की छवि को लेकर परिवार बहुत सचेत रहा। फरवरी 2005 में पिता कमरूल हक और 2015 में चांद खान रघुनाथपुर विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़े थे।
सीवान में 15 प्रतिशत मुस्लिम वोट
सीवान में तकरीबन 15 फीसदी मुस्लिम वोट है। सबसे बड़ी लड़ाई इस वोट बैंक का वारिस बनना है। जिस सीवान कि सल्तनत को शहाबुद्दीन छोड़ गए हैं उस पर सबकी निगाह है। रईस खान जैसे लोग जानते हैं कि सीवान की सल्तनत हासिल करके वह सिर्फ इस जिले ही नहीं, बल्कि बिहार का मुस्लिम चेहरा बन जाएंगे। वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय बताते हैं कि 90 के दशक में सीवान में कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व था और बड़े जमींदारों की जमीन पर कब्जा करने का तेजी से सिलसिला शुरू हुआ था।
बड़े जमींदारों की जमीन हड़पी जा रही थी और उधर शहाबुद्दीन के अपराध के किस्से भी सुर्खियों में आने लगे थे। शहाबुद्दीन ने वैसे जमींदारों का साथ देना शुरू किया, जिसकी जमीन छीनी जा रही थी। शहाबुद्दीन ने खुलकर जमींदारों का साथ दिया। इसलिए शहाबुद्दीन का मुसलमानों के साथ-साथ सभी वर्गों में बराबर का प्रतिनिधित्व था। शहाबुद्दीन के रूतबे और हैसियत को पाना आसान नहीं है। शहाबुद्दीन राजनीतिक रूप से काफी मजबूत नेता थे।
शहाबुद्दीन और सीवान एक-दूसरे का पर्याय बन गए थे
रवि उपाध्याय बताते है कि शहाबुद्दीन की पहचान सीवान से है और सीवान की पहचान शहाबुद्दीन से है। सीवान में समांतर शहाबुद्दीन की सरकार चलती थी। उनके रहते सीवान में डॉक्टर से लेकर बस के किराये तक पर अंकुश लगा था। उनके नहीं रहने पर उनके वोट बैंक बंटवारा हुआ है और उस वोट बैक को इक्कठा करने के लिए राजनीतिक पार्टियां भी निगाहें टिकाई हुई है। लिहाजा, ओसामा शहाब से कई दलों के नेताओं की मुलाकात हो चुकी है। फैसला ओसामा को लेना है।



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