बिहार में कांग्रेस का हाल बद से बदतर हो गया है। बोचहां उपचुनाव में कांग्रेस को नोटा से भी कम वोट मिले है। कांग्रेस प्रत्याशी को मात्र 1336 यानी 0.79 फीसदी वोट मिले हैं। जबकि 2967 वोटर्स ने नोटा दबाया है। उपचुनाव के रिजल्ट के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अनिल शर्मा ने कहा है कि- ‘बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर नई नियुक्ति को परंपरागत जनाधार को मजबूत करने के प्रयास में बिहार की जमीनी राजनीतिक सच्चाई को नजरअंदाज नहीं करनी चाहिए
उन्होंने कहा कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, विधान मंडल और विधान परिषद का नेता पद, चुनाव अभियान समिति और समन्वय समिति के अध्यक्ष पदों पर अल्पसंख्यक, पिछड़ा, अति पिछड़ा, अनुसूचित जाति एवं सवर्ण जातियों को प्रतिनिधित्व देकर संगठन को बिहारी समाज का आईना बनाने की कोशिश करनी चाहिए। प्रमुख पांचों पदों पर एक ही समुदाय या जाति को एक से अधिक पद देने से बचना चाहिए। आवश्यक होने पर सभी पदों पर एक साथ भी नई नियुक्ति की जा सकती है।’
प्रदेश कांग्रेस के ज्यादातर बड़े पदों पर सवर्ण
भास्कर ने यह खबर लाई थी कि कांग्रेस के जिलाध्यक्षों में 25 जिलाध्यक्ष सवर्ण हैं, अति पिछड़ा दो और वैश्य एक भी नहीं है। अध्यक्ष पद पर सवर्ण रहे, चार कार्यकारी अध्यक्षों में से दो सवर्ण, एक दलित और एक मुस्लिम हैं, विधायक दल के नेता सवर्ण हैं। कांग्रेस कंपेनिंग कमेटी के चेयरमैन सवर्ण हैं। यानी प्रदेश स्तर के सात शीर्ष पदों में से पांच सवर्ण के पास हैं जिनमें तीन भूमिहार, एक राजपूत और एक ब्राह्मण हैं।
सिर्फ वोट कटवा बनती जा रही कांग्रेस!
कांग्रेस न सही रणनीति बना सकी और न सही चाल चल सकी। हालत यह है कि बिहार विधान सभा की ज्यादातर सीटों पर कांग्रेस को अब लोग वोट कटवा से ज्यादा कुछ नहीं मानते। आने वाले समय में राजद, कांग्रेस के साथ होगी कि नहीं यह भी कहना मुश्किल है! साथ होगी भी तो राजद का दबदबा होगा।



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