वैशाली जिले के सरसई गांव में लोग चमगादड़ों को देवदूत के रूप में मानते हैं। इनकी पूजा भी करते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि चमगादड़ उनकी रक्षा करते हैं। गांव से इनका सदियों पुराना रिश्ता बताते हैं। गांव के सरसई पोखर के पास दर्जनों पेड़ों पर सैकड़ों की संख्या में चमगादड़ रहते हैं। वे फलों की तरह पेड़ की टहनियों से लटके हुए रहते हैं।

गांव में आसमान में उड़ते चमगादड़।
बाहरी शख्स को देखकर चिल्लाते हैं चमगादड़
सरसई पोखर स्थित महादेव मंदिर के पुजारी महात्मा शंभु नाथ शर्मा का कहना है कि इन चमगादड़ के गांव में निवास करने से गांव में कभी भी महामारी नहीं हुई। कई साल पहले गांव में महामारी फैली थी तो सभी चमगादड़ चले गए थे। लेकिन, फिर से इस गांव में वापस आ गए हैं।
यह सभी चमगादड़ प्राचीन काल से है। यह चमगादड़ किसी का कुछ नहीं बिगाड़ते हैं। बल्कि, इस गांव को असामाजिक तत्वों से भी बचाते हैं। चमगादड़ जब भी किसी बाहरी व्यक्ति को देखते हैं तो सभी चमगादड़ एक सूर में तेज आवाज में चिल्लाने लगते हैं, इससे ग्रामीण अलर्ट हो जाते हैं।

मंदिर के पास लोग चमगादड़ की भी पूजा करते हैं।
किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते
सरसई गांव निवासी आरती सिंह का कहना है कि यह चमगादड़ आदिकाल से यहां पर है। ग्रामीण इसे भगवान के रूप में मानते हैं। अहले सुबह कौआ से पहले चमगादड़ चिल्लाने लगते हैं। इससे ग्रामीण समझ जाते हैं कि अब सुबह हो गई। गांव के लोग कभी चमगादड़ को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। लोगों का मानना है कि जब तक चमगादड़ गांव में है। यहां समृद्धि और शांति बनी हुई है।

गांव के पास पोखर।
मांगलिक कार्य से पहले पूजा
सरसई सरोवर (पोखर) के पास चमगादड़ को देखने के लिए दूसरे गांव से भी लोग यहां आते हैं। वे भी चमगादड़ों की पूजा करते हैं। गांव में भी किसी के यहां कोई मांगलिक कार्य होता है तो पहले चमगादड़ की पूजा होती है।



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