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तिरंगे से कैसे जलता है 150 घरों का चूल्हा, हर साल 2000 तिरंगे बनाते हैं कारीगर; UP, झारखंड, बंगाल, उड़ीसा में होती है सप्लाई

राष्ट्रीय पर्व पर इस तिरंगे की मांग और बढ़ जाती है। अपने देश में तिरंगे का निर्माण बहुत सारे शहरों में उसके प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। लेकिन, गोपालगंज के खादी ग्रामोद्योग में बने झंडे ना सिर्फ गुणवत्ता में बेहतर है बल्कि इसके निर्माण में लगे करीब 150 लोगों को रोजगार भी मिलता है। इससे कई घरों के चूल्हे जलते हैं। गोपालगंज शहर के कॉलेज रोड स्थित खादी ग्रामोद्योग संघ द्वारा पिछले 50 वर्षों से तिरंगा झंडा का निर्माण किया जाता है। यहां के निर्माण किये गए तिरंगे यूपी, झारखंड, बंगाल और उड़ीसा में सप्लाई की जाती है। इससे कई बेरोजगारों को रोजगार का भी अवसर मिलता है।

एक लाख रुपए की बचत होती है
प्रतिवर्ष करीब 2 हजार से ज्यादा तिरंगे का निर्माण किया जाता है। इसमें कुछ आमदन 6 लाख की आमदनी के साथ एक लाख रुपए की बचत होती है। झंडे के निर्माण के लिए सूत कताई समेत विभिन्न कार्यों में अधिकांश महिलाएं कार्य कर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करती है। इतना ही नहीं गोपालगंज के खादी ग्रामोद्योग में पिछले 50 सालों से तैयार हो रहे तिरंगे को बिहार के अलावा पड़ोसी राज्य यूपी, झारखंड, बंगाल तथा उड़ीसा में फहराए जाते हैं।

तिरंगा निर्माण कार्य में लगीं महिलाएं।

तिरंगा निर्माण कार्य में लगीं महिलाएं।

डेढ़ सौ लोग लगे रहते हैं निर्माण में
तिरंगे के निर्माण में करीब आधा दर्जन कारीगर के अलावा सुत कताई में 104 महिला, 40 बुनकर जिसमे 15 महिला समेत डेढ़ सौ लोग लगे रहते हैं। तिरंगा निर्माण में लगे लोगो को तिरंगा निर्माण करना काफी अच्छा लगता है, क्योंकि देश के आन-बान और शान कहे जाने वाले तिरंगे के निर्माण में उनका सहयोग लिया जाता है।

सूत काटने में जुटीं महिलाएं।

सूत काटने में जुटीं महिलाएं।

विभिन्न राज्य और शहरों में सप्लाई
तिरंगे का निर्माण कर रहे कारीगर समसुल मियां कहते हैं, कि मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे तिरंगा निर्माण की जिम्मेदारी मिली है। मोतिहारी के जिले के मूल निवासी समसुल मियां आगे कहते हैं कि देश का तिरंगा बनाकर गर्व की अनुभव होता है। वैसे तो खादी ग्रामोद्योग खादी कपड़ों के बारे में पहचान रखता है, लेकिन इस खादी ग्रामोद्योग में पिछले 50 सालों से तिरंगे के निर्माण का कार्य अनवरत जारी है। यहां के बनाए हुए झंडे विभिन्न विभिन्न राज्य और शहरों में सप्लाई की जाती है। क्योंकि यहां के बने तिरंगे में शुद्धता और गुणवता के अलावा उचित मूल्य भी रखी गयी है। शुद्ध खादी कपड़ों से बने इस तिरंगे की मांग इतनी है कि महीनों पूर्व इसकी बुकिंग कर दी जाती है।

झंडा तैयार करते कारीगर।

झंडा तैयार करते कारीगर।

मानक के हिसाब से खादी का तिरंगा ही फहराया जाना चाहिए
खादी ग्रामोद्योग संघ के अध्यक्ष सुदर्शन चौबे का कहना है कि मार्केट में आज भले ही प्लास्टिक और टेरीकॉट के तिरंगे आ गए हैं, लेकिन मानक के हिसाब से जो तिरंगा फहराया जाना चाहिए वह खादी का तिरंगा ही हो सकता है। यहां तिरंगे को बहुत सम्मान के साथ बनाया जाता है और रखा जाता है। यहां हाथ से सुत कताई कर कपड़े का निर्माण किया जाता है, फिर उसे मानक के अनुसार तिरंगे का रूप दिया जाता है।

उनका कहना है कि गैर कानूनी तरीके से बाजारों में प्लास्टिक के तिरंगे का निर्माण कर बेचा जा रहा है, जो देश की सम्मान के लिए ठीक नहीं है। गोपालगंज में तैयार तिरंगे के मानक के अनुसार विशेष लंबाई चौड़ाई के अनुपात में बनने वाले तिरंगे की कीमत साइज के अनुसार तय की गई है।

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