राजस्थान के धौलपुर जिले में चंबल किनारे स्थित है अचलेश्वर महादेव का मंदिर. धौलपुर जिले की अंतिम सीमा पर चंबल से ठीक पहले नीचे की तरफ बीहड़ों में एक सुनसान रास्ता उतरता है. यहां से करीब डेढ़ किलोमीटर अंदर स्थित है अचलेश्वर महादेव का मंदिर.यूं तो देश के कोने कोने में रह’स्यों से भरे शिव मंदिर हैं, लेकिन यहां के शिव का रूप अद्भुत है. यह दिन के तीन पहरों के साथ अपना रंग बदलने की कहानी सिमेटे हुए है. कहा जाता है कि सुबह छह बजे से दोपहर करीब तीन बजे तक इस शिवलिंग का रंग हल्का केसरिया रहता है. तीन बजे से इसका रंग हल्का सफेद होने लगता है. फिर रात को यही शिव लिंग मटमैले रंग का हो जाता है.यह मंदिर 1875 का बना बताया जाता है. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि यह मंदिर उससे भी सैंकड़ों साल पुराना है, लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक यह 1875 के आस पास का ही बताया जाता है. उस जमाने में यहां डकैतों का राज था और बीहड़े में आने से लोग कतराते थे.

मंदिर की स्थापना के बारे में प्रचलित कथा के अनुसार उस वक्त कुछ साधु इस शिवलिंग को चंबल के उस पार ग्वालियर ले जा रहे थे. लेकिन रास्ते में उन्हें यहां रात हो गई. इमली के दो पेड़ और एक कुंआ देखकर साधुओं ने यहां रात्री विश्राम करना तय किया. साधुओं ने अगले दिन सुबह शिवलिंग को लेकर ग्वालियर जाने की तैयारी की, लेकिन वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ.साधुओं ने स्थानीय लोगों और ग्वालों का बुलाकर शिव लिंग को वहां से उठाने का प्रयास किया गया लेकिन सब व्यर्थ रहा. गांव वालों और स्थानीय ग्वालों ने खुदाई शुरू की तो लोग हैरत में पड़ गए. शिव लिंग नीचे एक सांप की बाम्बी के अंदर धंस चुका था और पचास फीट तक उसका कोई अंत नहीं मिला.स्वभाव के मुताबिक अनंत कहे जाने वाले शिव यहां से नहीं हिले और अचल हो गए. इसलिए उनका नाम अचलेश्वर रखा गया और वहीं विराजित कर दिया गया. आज भी अचलेश्वर नाम से यहां इस शिवलिंग की पूजा की जाती है.




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