मुजफ्फरपुर में बहरुपिया त्यौहार व कार्यक्रमों के अनुसार अपना रूप बदलकर घर घर व बाजारों में लोगो को हसाने के लिए व मनोरंजन कराने जाता था। इसके एवज में उन्हें कुछ पैसे भी दिया जाता था। हालांकि इस कला का चलन अब कम हो गया है। लेकिन जो कलाकार अब बचे है। उनकी भी समय के साथ कला बदलते जा रही है। हालांकि, मुजफ्फरपुर में इन दिनों एक बहरुपिया ग्रामीण इलाकों में दिखने को मिल रहा है। जो अलग-अलग रूप धारण कर लोगो का मनोरंजन करा रहा है। इसके लिए उसे राहगीर कुछ पैसे भी दे रहे है। जिससे उनका घर भी चल रहा है।


मधुबनी इलाके में दिखा बहरुपिया ने पीके फ़िल्म के तर्ज पर पीके का रूप धारण कर लिया। साथ ही सिर पर पिला हेलमेट, गले मे रेडियो, माला आदि समेत अन्य सामान पहनकर लोगो का मनोरंजन करा रहा है। शहर में क्रूर सिंह का रूप बनाकर घूम रहा है। इस दौरान वह जहां मांगने जाता है वहा पीके फ़िल्म का डायलॉग के अलावा, अन्य कई डायलाग बोलकर लोगो को हसाने व मनोरंजन करने का काम कर रहा है।


बहरूपिया ने बताया कि वह मुजफ्फरपुर का रहने वाला है। लोगों का मनोरंजन करना उनका पेशा है। उन्होंने बताया कि बहरूपिया कला के माध्यम से विभिन्न प्रकार के रूप रखे जाते है। अभी वह पीके बनकर घूम रहे हैं। इससे पहले वह ग्वाला, नारद मुनि, भगवान शिव शंकर, अभिनेता बनते थे। बताया कि रूप के अनुसार ही उनके डायलॉग बदल जाते हैं। जिसे सुन लोग अपने आपको हंसे बिना नहीं रोक पाते हैं। उन्होंने बताया कि पूर्वजों की परंपरा निभा रहे हैं। बताया कि वह कई वर्षों से बहरूपिया बन लोगों को हंसा रहा है।





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