शहर के मिठे इलाके मिठनपुरा की बात हो या जलजमाव वाले किसी और इलाके की. बारिश के बाद जलजमाव से लोगों की जिंदगी में दुर्गंध का वास हो गया है. सांसों में सड़ा हुआ पानी सड़ांध मार रहा है. लोगों की सांसें थम रही हैं. बुजुर्ग बीमार और लाचार काफी परेशान हैं. शहर की सरकार सो रही है. शहर के प्रतिनिधि चैन की वंशी बजा रहे हैं. क्योंकि उनके घरों तक पानी नहीं पहुंचा है. खुद संगमरमर वाले टाइल्स लगे घर में अखबार पढ़ते हुए टहल रहे हैं, लेकिन आम लोगों का दर्द समझने वाला कोई नहीं है.


अब मिठनपुरा को ही ले लीजिए. शहर की सरकार यानी नगर निगम की ओर से पानी निकासी के लिए 15 जगह मोटर लगे हैं. लोग इतने परेशान हैं कि तरह-तरह से आक्रोश जता रहे हैं. कोई विधायक के घर के सामने बैंड बजवा रहा है. कोई अनिश्चित कालीन अनशन पर बैठा है. डीएम साहब वीडियो कांफ्रेसिंग कर सामुदायिक किचेन चलाने की बात कर रहे हैं. माले कार्यकर्ता हाथ में लाल झंडे लेकर जमे हुए पानी के खिलाफ क्रांति लिख रहे हैं. लेकिन जलजमाव के दर्द से कोई निजात दिलाने के लिए तैयार नहीं है.


शहर से सटी बड़ी आबादी आभाव में जीने को मजबूर है लेकिन शहर की सरकार लापरवाही का कंबल ओढकर कर्महीनता का घी पीने में मस्त है. लोगों ने विधायक को टेलीफोन करने का नया तरीका निकाला जो ज्यादा से ज्यादा फोन करेगा उसे पुरस्कार दिया जाएगा. लेकिन निगम के दोषी अधिकारी और कर्मचारी साफ बचे हुए हैं क्योंकि वो जनप्रतिनिधि की श्रेणी में नहीं आते. जवाबदेही उनकी भी तय होनी चाहिए, सवाल सबसे बड़ा है ऐसा आखिर करेगा कौन.

सुनने में आया है कि जिले के मालिक गुरुवार को काफी नाराज थे. उन्होंने वीडियो कांफ्रेंस कर सभी सीओ से बातचीत की और लोगों को सभी सुविधा मुहैया कराने का आदेश दिया. लेकिन फिर पचड़ा फंस गया कई अधिकारियों ने आपदा प्रबंधन से राशि नहीं मिलने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया. हाईटेक बैठक भी बेकार गई.
समस्या जस की तस है. कई इलाकों में केले और थर्मोकॉल की नाव जीवन की पतवार के साथ चल रही है और जुगाड़ के साथ जिंदगी में रफ्तार लाने का प्रयास जारी है. चर्चा ये है कि स्थिति जस की तस है. आखिर कब तक. आखिर कब तक आपके टैक्स के पैसों से शहर की सरकार चलेगी लेकिन सुविधा शून्य रहेगी. सोचिएगा जरूर.




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