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चक्रवात यास के कारण मुजफ्फरपुर के मक्का किसानों को बहुत बड़ा नुकसान

खेती ने आधुनिक रूप जरूर ले ली है, मगर किसानी की कई परंपरा अब भी जिंदा है। तैयार फसल को सहेजने के लिए गांवों में छोटी-छोटी कोठी से लेकर बड़ी बेढिय़ां (बांस के आधार वाली बड़ी कोठी) बनाई जाती हैं। इस परंपरा को कायम रखते हुए बोचहां प्रखंड की लोहसरी पंचायत के कई किसानों ने अनाज उत्पादन की क्षमता के अनुरूप बेढिय़ां बनाई हैं। बेहतर फसल की उम्मीद पर इस वर्ष कुछ नई बेढिय़ां भी बनाईं। कोरोना की वजह से पिछले वर्ष मकई को कम कीमत मिलना भी इसके पीछे कारण रहा।

किसानों ने सोचा कि बेहतर कीमत नहीं मिलने पर इसमें मकई रख दिया जाएगा। जब अच्छी कीमत मिलेगी तब उसकी बिक्री की जाएगी, मगर किस्मत ने यहां भी धोखा दे दिया है। इस वर्ष मकई की तैयार फसल के बीच यास चक्रवात ने उसे तबाह कर दिया। खेतों में पानी भर जाने से मकई भींग गया। उसमें नमी के साथ अंकुरण आ गया है। इसे तैयार कर जल्दी से जल्दी किसी तरह बेचना किसानों की मजबूरी है। कीमत तो जो मिलेगी सो मिलेगी। इस बार उधार ही बेचना होगा। 

पिछले बीस वर्षों से मकई की खेती कर रहे मुकेश कुमार कहते हैं, यह स्थिति कभी नहीं आई थी। फसल देखकर रोना आ रहा है। 50 फीसद तो समझिए पानी के कारण बर्बाद हो गया है। जो बचा है उसे रख नहीं सकते। दाना काला हो रहा है। कीमत 12 से 13 सौ रुपये प्रति क्विंटल ही मिल रही। ऊपर से खेतों से ट्रैक्टर से मकई ढुलवाने में अलग से पैसा लग रहा। किसान तो कहीं का नहीं रहा।

बड़ी-बड़ी पांच बेढिय़ां बनवाने वाले कामेश्वर मिश्रा कहते हैं, इसमें पांच सौ ङ्क्षक्वटल तक मकई रखा जा सकता था। बाद में बेहतर कीमत मिलने पर उसे बेचते, मगर जो मकई तैयार हुआ है उसे नहीं रख सकते। वह खराब हो जाएगा। औने-पौने दाम में बेचने के अलावा कोई चारा नहीं है।

किसानों के इस दर्द से अनजान विभाग के पदाधिकारी किसी प्रयास के बदले तंज ही कसते हैं। जिला कृषि पदाधिकारी चंद्रशेखर सिंह कहते हैं, यह रबी नहीं गरमा फसल है। किसानों ने भुट्टा निकालकर खेत में फसल छोड़ दी है। नियम के मुताबिक जो फसल कट चुकी है उसका मुआवजा नहीं दिया जा सकता। विभाग के नियम और पदाधिकारी का उदासीन रवैया किसानों के जख्म पर मरहम की जगह नमक ही छिड़क रहा है।  

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