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मुजफ्फरपुर : कोरोना ने मक्का किसानों की तो’ड़ी कमर, बारिश ले रही अग्निपरीक्षा

जिले के मक्का किसानों पर इस वर्ष दोहरी मा’र पड़ी है। कोरोना के कारण पिछले वर्ष कम दाम में बेचने की मजबूरी ने उनकी कमर तोड़ दी थी। इस वर्ष भी वही हाल है। ऊपर से यास चक्रवात के कारण हुई बारिश ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। तैयार फसल वाले खेतों में पानी भरा है। जो फसल लगी हुई है उसे काटा नहीं जा सकता। जो फसलें कटी हुई हैं, उसकी छिलनी नहीं हो सकती। वहीं जो फसल किसान घर ले आए, उसमें नमी के कारण दाना तैयार नहीं हो सकता। मौसम भी साथ नहीं दे रहा। धूप नहीं होने से मकई में अंकुरण हो गया है। कड़ी धूप नहीं निकली तो यह पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।

जिले में करीब 12 हजार हेक्टेयर में रबी में मक्के की खेती होती है। इसमें बोचहां की लोहसरी पंचायत में ही करीब दो हजार हेक्टेयर में पांच सौ से अधिक किसान मक्का उपजाते हैं। कभी इस क्षेत्र में शकरकंद और ईख की खेती होती थी। 20 वर्ष पहले कुछ किसानों ने यहां मक्के की खेती शुरू की थी। नकदी फसल और बेहतर उत्पादन के कारण किसान इसकी खेती की ओर आकॢषत हुए

कोरोना से पहले वर्ष 2019 में जहां भाव दो हजार से 2400 रुपये प्रति क्विंटल था, वहीं पिछले साल तकरीबन एक हजार रुपये प्रति क्विंटल मिला था। इस बार पैदावार अच्छी हुई है। एक बीघा में करीब 40 क्विंटल उपज हो रही, मगर आधी फसल खेत में ही है। जो फसल घर आई है, उसका रेट भी 13 सौ रुपये क्विंटल तक मिल रहा। गरहां-हथौड़ी मार्ग में सड़क पर ही मकई रखने वाले राजेंद्र सहनी कहते हैं, पांच बीघा में खेती कइली रही। आधा फसील तैयार कइली, मगर दाम ना मिलल। 13 सौ रुपये क्विंटल बेचली। जे फसील बचल हई ओकर तैयार होला में दिक्कत है। रोजे बादल देख के कलेजा कांपै ये।

लागत निकलनी भी मुश्किल

क्षेत्र के बड़े किसान नीरज नयन कहते हैं कि उनका 25 बीघा मक्का पानी में है। यह निकल पाएगा या नहीं कहना मुश्किल है। इस पर किसी की नजर नहीं है। जो फसल तैयार है उसकी कीमत नहीं। 12 सौ से 13 सौ रुपये प्रति क्विंटल भाव है। वह भी उधारी मांगा जा रहा है। बमुश्किल लागत निकल जाए तो बहुत है। वह कहते हैं कि सरकार ने मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपये प्रति क्विंटल तय तो कर दिया है, मगर इसकी खरीद कहां होगी, यह तय नहीं। रैक प्वाइंट नहीं होने से मक्का बाहर भेजना मुश्किल है। कोरोना के कारण व्यापारी भी नहीं आ रहे। स्थानीय स्तर पर मक्का आधारित कई फैक्ट्रियां खुलीं तो किसानों में आस जगी थी। वहां से भी निराशा ही है।

व्यवस्था से नाराज कामेश्वर मिश्रा (74) कहते हैं कि कमीशन के खेल में किसान मारे जा रहे हैं। गेहूं की सरकारी खरीद हो रही। हम बेचना चाह रहे तो पैक्स लेने को तैयार नहीं। अब मक्का बर्बाद हो रहा है। कोई देखने वाला नहीं। जिला कृषि पदाधिकारी चंद्रशेखर सिंह ने कहा कि फसल क्षति का सर्वे किया जा रहा है। इसकी रिपोर्ट सरकार को भेजी जाएगी। इसके बाद सरकार के निर्णय पर आगे की कार्रवाई होगी। जो फसल खेत में लगी होगी, उसपर ही मुआवजा दिए जाने का प्रावधान है। जो फसल कट गई होगी उसपर मुआवजा नहीं दिया जा सकता। 

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