विविधता का खजाना कहे जाने वाले वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना का वन क्षेत्र आग की लपटों की चपेट में बार-बार आ रहा है । दु’र्लभ वन्य जीवों व वनस्पतियों वाले इस जंगल में आग से नुक’सान की खबर है। बढ़ती अ’गलगी की घट’ना के बावजूद वन विभाग ने सबक नहीं लिया। वन क्षेत्रों को आग से बचाने के लिए फायर वाचरों की तैनाती के बाद भी जंगलों की हिफाजत चुनौती साबित हो रही है। पर्यटन नगरी का ऐतिहासिक वन क्षेत्र के बरवा माथी के समीप वन क्षेत्र संख्या टी 34 डंडिया जंगल में शुक्रवार की देर शाम आग की चपे’ट में आ गया। सूत्रों के अनुसार शरारती तत्वों ने आ’ग लगा दी।
जंगल में सूखे पत्ते ने हवा के झोंके में चिंगारी भड़काने का काम कर दिया। देखते ही देखते विकराल आग की लपटों ने पांच एकड़ वन क्षेत्र का क्षेत्रफल चपेट में ले लिया। आग के बेकाबू होने से बड़ी संख्या में छोटे वन्य जीवों को क्षति होने की आशंका है। वनकर्मियों की तत्परता से आग पर काबू पाया जा सका । लेकिन, तब तक आग पांच एकड़ में लगे वन संपदा खाक कर चुकी थी। रेंजर के अनुसार दोबारा वन क्षेत्र में आग न भड़के, पैनी नजर रखी जा रही है। राहगीरों के साथ ही घूमने निकले लोगों पर भी कड़ी निगाह रखी जा रही है। जानकारों की मानें तो वीटीआर के वनों में कई तरह की जैव विविधता मिलती है। लेकिन, ईधन, चारे, लकड़ी की बढ़ती हुई मांग, वनों के संरक्षण के अपर्याप्त उपाय और वन भूमि के गैर-वन भूमि में परिवर्तित होने से वे खत्म होते जा रहे हैं।









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