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कोरोना वैक्सीन पर सियासत ग़लत ‘भरोसे का टीका’ ही स्वस्थ व आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम..

कोरोना वैक्सीन पर सियासत बाजिब नहीं,

‘भरोसे का टीका’ ही स्वस्थ व आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम

हरि वर्मा

कोरोना वैक्सीन को लेकर सियासत जारी है। वैक्सीन की विश्वसनीयता पर विपक्ष सवाल खड़े करते रहा है, वहीं तीसरे ट्रॉयल में भी स्वदेशी कोवैक्सीन गुणवत्ता की कसौटी पर 81 फीसदी खरा उतर चुका है। यह महज
संयोग है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब स्वदेशी कोवैक्सीन टीका लगवाया, उसी दिन शाम तक वेबसाइट क्रैश व सर्वर पर लोड होने के बावजूद न केवल 25 लाख लोगों ने टीकाकरण के लिए पंजीयन कराया बल्कि 5 लाख लोगों ने टीके भी लगवाए। दूसरे दिन पंजीयन का यह आंकड़ा 50 लाख पार कर ‌गया। दुनिया में कहीं भी 48 घंटे में 50 लाख पंजीयन का यह रिकॉर्ड है। मोदी के टीके के बाद यह ‘भरोसे’ का ही नतीजा है। यह
स्वस्थ व आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ता कदम भी। जरा इससे पहले के आंकड़ों पर गौर कीजिए तो 16
जनवरी से 28 फरवरी तक डेढ़ महीने में डेढ़ करोड़ योद्धाओं का भी टीकाकरण नहीं हो सका, जबकि लक्ष्य
तीन करोड़ का था। 45 दिन में डेढ़ करोड़ से भी कम यानी औसत तीन-सवा तीन लाख।
टीके की विश्वसनीयता को लेकर सियासी सवाल उठाया जाना गलत है। जिन टीकों कोवैक्सीन-कोविशील्ड को योद्धाओं के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने आपातकालीन मंजूरी दी, उसी पर सवाल उठाते हुए छत्तीसगढ़ के
स्वास्थ्य मंत्री ने अपने यहां इस्तेमाल की मंजूरी नहीं दी। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर कोवैक्सीन पर एतराज जताया। एक आंकड़े के मुताबिक, टीके लगवाने वालों में देश में 40 लोगों की मौत हुई, लेकिन इनमें एक की भी मौत की वजह टीका नहीं है। फिर भी टीके पर ही सवाल उठाया जाता रहा, जो गलत है। अफवाहों को सियासी कारणों से हवा मिली। सपा के अखिलेश यादव, कांग्रेस के अधीर रंजन, रणदीप
सुरजेवाला, मनीष तिवारी को भाजपा के इस टीके पर भरोसा नहीं। काश! सवाल उठाने वाले चिकित्सा
वैज्ञानिकों पर भरोसा कर लिए होते। अब तो स्वदेशी कोवैक्सीन के तीसरे चरण के ट्रॉयल की रिपोर्ट भी आ गई
है जिसमें यह 81 फीसदी कसौटी पर खरा उतरा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन भी साफ करते हैं कि कोरोना
टीके की वजह से देश में एक भी मौत नहीं हुई। यहां यह भी बता दें कि वैक्सीन की शुरुआत में ही चर्बी से जुड़े
सवाल उठाकर धर्म विशेष में अविश्वास पैदा किया गया। याद करें वह दिन जब पोलियो टीके को लेकर
तरह-तरह की अ‍फवाहें फैलाई जाती थी। धर्म ‌विशेष को नपुंसक बनाने की अफवाहें तैरती थीं। धर्म विशेष के
लोग टीका लगाने वाली टीम का विरोध करते थे। यही कारण है कि पोलियो का देश से अब तक पूरी तरह उन्मूलन नहीं हो सका। प्लेग के टीके बने थे, तो इसके ट्रॉयल कैदियों पर किए गए थे। टीकाकरण की सफलता से ही प्लेग और चेचक जैसी बीमारियों पर पूरी तरह नियंत्रण पाया जा सका, लेकिन पोलियो के इक्के-दुक्के मामले अब भी निकल ही आते हैं। स्वास्थ्य से जुड़ी वैक्सीन मुहिम को सियासत या धर्म के चश्मे से देखा जाना गलत है। अब जब मोदी ने टीके के बाद अपनी तस्वीर ट्वीट की तो उस पर भी बखेड़ा खड़ा हुआ। मोदी ने तो
टीकाकरण का अपना प्रमाण भी सार्वजनिक तौर पर जगजाहिर किया है। दअसल, इसका मकसद भरोसा पैदा करना और टीकाकरण का ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार करना है। पंजीयन में आई खामी अब तक पकड़ में नहीं आई है और माना जा रहा है
कि यह इंटरनेट नेटवर्किग, सर्वर और वेबसाइट पर लोड का नतीजा है। इससे लोगों को असुविधा हो रही है।
कोरोना टीकाकरण से जुड़ी एक लाभार्थी प्रेरणा नारायण ने बताया कि पहले दिन उन्होंने ऑनलाइन बुक‌िंग कराई।
धर्मशिला नारायण अस्पताल में सुबह 90 लोगों को टीका लगा। सब कुछ सलीके से हुआ। अमूमन टीके के बाद थोड़ा दर्द महसूस हुआ। दरभंगा की स्वास्थ्य योद्धा कोमल ने पहले चरण में टीका लगवाया। वह टीके पर
सवाल उठाने को सियासत का हिस्सा मानती हैं।

दरअसल, टीकाकरण की शुरुआत में ही संदेह, अफवाह और विवाद से लोगों के मन में डर बैठ गया था।
कोरोना मुक्त भारत के लिए यह जरूरी है कि लोगों का टीके पर भरोसा जमे। ऐसे में स्वयं मोदी ने उस
कोवैक्सीन का टीका लगवा कर भरोसा पैदा किया, जिस पर विपक्ष सवाल खड़े करता रहा। विपक्ष की ओर से
चुनौती दी गई कि टीका पहले मोदी को लगाना चाहिए था। अब मोदी ने खुद टीका लगवा लिया है। मोदी के टीके
लगवाने की तस्वीर को सियासी चश्मे से देखा गया। किसी को असम का गमछा नजर आया, किसी को केरल-पुडुचेरी की नर्स, तो किसी को बंगाल का लुक। जिन्हें केरल-पुडुचेरी की नर्स निवेदा-रोसम्मा नजर आईं, उन्हें यह नजर नहीं आया कि देश में कोरोना का पहला मरीज केरल की मेडिकल छात्रा थी, जो वुहान से लौटी
थी। फिर कौन नहीं जानता कि नर्सिंग सेवा में केरल समेत दक्षिण भारत का दबदबा है, जिन्हें असम का गमछा
दिखा उन्हें यह याद नहीं रहा कि मास्क इस्तेमाल न करने वालों से मोदी पहले भी गमछे से मुंह ढककर बचाव
की अपील करते रहे हैं।

भारत बॉयोटेक के कोवैक्सीन और सीरम इंस्टीट्यूट के कोविशील्ड को आपातकालीन मंजूरी देकर टीकाकरण
अभियान जारी है। यह स्वस्थ भारत के लिए जरूरी है। शुरू में तो भारत बॉयोटेक और सीरम के बीच ही हितों
के टकराव की नौबत रही। स्वदेशी टीका कोवैक्सीन लेकर मोदी ने वोकल फॉर लोकल यानी आत्मनिर्भर भारत
का मंत्र भी मजबूत किया। इतना ही नहीं केंद्र ने वैक्सीन की कीमत महज 150 प्लस ‌नर्सिंग स्टाफ खर्च सौ
रुपये यानी ढाई सौ रुपये प्रति डोज तय की है। यानी आम लोगों की पहुंच के दायरे में। अति जरूरतमंदों के लिए
सरकारी केंद्रों में मुफ्त। अभी रूस की स्पूतनिक मंजूरी के लिए विचाराधीन है। विदेशी कंपनी के लिए इस भाव
पर यहां आपूर्ति फायदे का सौदा नहीं है। ऐसे में विदेशी कंपनियों के लिए भारत में ही वैक्सीन बनाने की मजबूरी भी। यह वैक्सीन अभियान स्वस्थ भारत के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर कदम साबित होगा।

अब बिहार में सरकारी केंद्रों और निजी अस्पतालों में टीकाकरण पूरी तरह मुफ्त है। चुनाव में ऐसा वादा किया
गया था। धीरे-धीरे डबल ‌इंजन वाले राज्यों में यदि यही फॉर्मूला अपना लिया जाए तो कोई हैरानी नहीं होगी। केंद्र
से राज्यों को खुला प्रस्ताव है कि जो राज्य टीकाकरण मुफ्त करना चाहते हैं, वे 150 रुपये के हिसाब से टीके
की कीमत दे कर इसे अपने यहां लागू करा सकते हैं। बंगाल में ममता बनर्जी और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल पहले से ऐसा मन बना चुके हैं। जिन चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु व एक केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में चुनाव हैं, वहां सत्ता पक्ष और विपक्ष मुफ्त टीकाकरण का वादा घोषणा पत्र में कर दे, तो इसमें
भी आश्चर्य नहीं। यूं भी केंद्र ने बजट में 3500 हजार करोड़ का प्रावधान कर स्वस्थ भारत की दिशा में जल्द
बड़ी आबादी को टीकाकरण के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा है।

आंकड़े बताते हैं कि संक्रमण का खतरा अभी टला नहीं है। दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, ब्रिटेन से नये स्ट्रेन आने के
बाद हड़कंप है। देश में 18-19 और कुल 23 म्यूटेशन, 8 हजार वेरिएंट (बदलाव) और 10 क्लेड का प्रभाव
है। विदेश के नये स्ट्रेन के करीब ढाई सौ मामले सामने आ चुके हैं। पिछले साल की तरह तापमान बढ़ने के
साथ ही संक्रमण के नये मामलों में तेजी आई है जो चिंता का विषय है। सवाल उठता कि क्या टीकाकरण पर सियासत होनी चाहिए। क्या टीके का कोई दल, जात, धर्म, क्षेत्र होता। नहीं न। ऐसे में बचाव का फार्मूला- अफवाह,

सवाल और सियासत कतई नहीं। बचाव के लिए जरूरी है-दवाई भी, क’ड़ाई भी।

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