6 मार्च दिल्ली में किसान आंदोलन के सौ दिन पूरे गए हैं। सौ दिन के आंदोलन का नतीजा अब तक सिफर रहा। सरकार और आंदोलनकारी किसान महज एक फोन कॉल की दूरी पर हैं, लेकिन कॉल कनेक्ट नहीं हो रही है। आंदोलन में सियासत दोनों तरफ जारी है। 26 जनवरी को लाल किले पर तिरंगा अपमान की घटना के बाद एक बार फिर आंदोलनकारियों ने सौ दिन पूरे होने पर 6 मार्च को कुंडली-मानेसर-पलवल (केएमपी) एक्सप्रेस वे जाम कर शक्ति प्रदर्शन का निर्णय लिया है। हालांकि यह समर्थन जुटाने और समर्थन परखने की कोशिश है। शनिवार को दिल्ली-एनसीआर बॉर्डर के आंदोलनस्थलों पर जाम की तैयारी है। 8 मार्च को महिला दिवस पर महिलाओं की जुटान होगी। 9 मार्च को संयुक्त मोर्चा आगे की रणनीति तय करेगा।
महज एक कॉल की दूरी
सरकार अब भी अपने पुराने प्रस्तावों पर कायम है। सरकार की आंदोलनकारी नेताओं से और आंदोलनकारी नेताओं की गांव- खेत-खलिहान के किसानों से महज एक कॉल की दूरी है। आंदोलनकारी किसानों का कहना है कि जब सरकार को जरूरत होगी, वार्ता के लिए खुद बुला लेगी। डटे किसान नेताओं की गांवों के किसानों से महज एक कॉल की दूरी है। जब बुलावा जाएगा, भारी संख्या में किसान पहुंच जाएंगे। खेती का समय है। बैसाखी से गेहूं की कटाई होगी। अप्रैल महीना किसानों के लिए अहम है। फसल के लिहाज से भी और सियासी फसल के नजरिए से भी। इससे पहले मार्च के आखिर में होली है। भाकियू डकौंदा के मंजीत सिंह धनेर का दावा है कि हम लंबे संघर्ष के लिए तैयार हैं। टिकरी समेत आंदोलनस्थल वाले बॉर्डर पर गर्मी से बचाव वाले पंडाल लगाए जा रहे हैं।







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