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कालभैरव जयंती आज; जीवन में भ’य से मु’क्ति पानी है तो आज करें शिव के रौद्र रूप की पूजा ‘जय भोलेनाथ’

जीवन के हर भ’य से मुक्ति को देने वाले हैं काल भैरव। भगवान शिव का रूप को जीवन के हर क’ष्‍ट को करता है दू’र। मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव अष्टमी के रूप में मनाई जाती है। काल भैरव को बीमा’री, भ’य, संक’ट और दु’ख को ह’रने वाले स्वामी माने जाते हैं। इनकी पूजा से हर तरह की मानसिक और शारीरिक परे’शानियां दू’र हो जाती हैं।धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी के अनुसार कालभैरव दो शब्दों से मि’लकर बना है। काल और भैरव। काल का अर्थ मृ’त्यु, ड’र और अं’त। भैरव का मतलब है भ’य को हरने वाला यानी जिसने भ’य पर जीत हासिल की हो।

काल भैरव की पूजा करने से मृ’त्यु का भ’य दूर होता है और क’ष्टों से मु’क्ति मिलती है। कालभैरव भगवान शिव का रौद्र रूप हैंं। काल भैरव की पूजा से रो’गों और दु’खों से निजात मिल जाता है।पंडित वैभव जोशी के अनुसार 19 नवंबर को मार्गशीर्ष माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि दोपहर 03 बजकर 35 मिनट से शुरू होगी और इसकी समाप्ति 20 नवंबर को दोपहर 01 बजकर 41 मिनट पर होगी। काल भैरव की पूजा रात्रि को शुभ मुहूर्त में की जाती है.

जन्‍म कथा

पंडित वैभव जोशी बताते हैं कि शिव के भैरव रूप में प्रकट होने की अद्भुत घट’ना है कि एक बार सुमेरु पर्वत पर देवताओं ने ब्रह्मा जी से प्रश्न किया कि परमपिता इस चराचर जगत में अविनाशी तत्व कौन है जिनका आदि-अंत किसी को भी पता न हो ऐसे देव के बारे में बताने का हमें क’ष्ट करें। इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि इस जगत में अवि’नाशी तत्व तो केवल मैं ही हूंं क्योंकि यह सृष्टि मेरे द्वारा ही सृजित हुई है। मेरे बिना संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जब देवताओं ने यही प्रश्न विष्णुजी से किया तो उन्होंने कहा कि मैं इस चराचर जगत का भरण-पोषण करता हूंं,अतः अविनाशी तत्व तो मैं ही हूंं। इसे सत्यता की कसौटी पर परखने के लिए चारों वेदों को बुलाया गया। चारों वेदों ने एक ही स्वर में कहा कि जिनके भीतर चराचर जगत, भू’त, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है,जिनका कोई आदि- अंत नहीं है,जो अजन्मा है,जो जीवन- मरण सुख- दुःख से परे है, देवता-दानव जिनका समान रूप से पूजन करते हैं, वे अविनाशी तो भगवान रूद्र ही हैं। वेदों के द्वारा शिव के बारे में इस तरह की वाणी सुनकर ब्रह्मा जी के पांचवे मुख ने शिव के विषय में कुछ अपमानजनक शब्द कहे जिन्हें सुनकर चारों वेद अति दु’खी हुए।इसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए।

ब्रह्मा जी ने कहा कि हे रूद्र! तुम मेरे ही शरीर से पैदा हुए हो अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम ‘रूद्र’ रखा है अतः तुम मेरी सेवा में आ जाओ, ब्रह्मा के इस आ’चरण पर शिव को भयानक क्रोध आया और उन्होंने भैरव नामक पुरुष को उत्पन्न किया और कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। उस दिव्यशक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सिर को ही का’ट दिया जिसके परिणामस्वरूप इन्हें ब्रह्महत्या का पा’प लगा। शिव के कहने पर भैरव ने काशी प्रस्थान किया जहां उन्हें ब्रह्मह’त्या से मु’क्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। आज भी ये काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। इनके दर्शन किए बिना विश्वनाथ के दर्शन अधूरे रहते हैं ।


ब्रह्मा जी ने कहा कि हे रूद्र! तुम मेरे ही शरीर से पैदा हुए हो अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम ‘रूद्र’ रखा है अतः तुम मेरी सेवा में आ जाओ, ब्रह्मा के इस आ’चरण पर शिव को भयानक क्रोध आया और उन्होंने भैरव नामक पुरुष को उत्पन्न किया और कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। उस दिव्यशक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सिर को ही का’ट दिया जिसके परिणामस्वरूप इन्हें ब्रह्महत्या का पा’प लगा। शिव के कहने पर भैरव ने काशी प्रस्थान किया जहां उन्हें ब्रह्मह’त्या से मु’क्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। आज भी ये काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। इनके दर्शन किए बिना विश्वनाथ के दर्शन अधूरे रहते हैं ।

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