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#AYODHYA; पिछले 500 सालों में मुगलों के साथ ल’ड़ीं थी 76 से ज़्यादा ल’ड़ाईयां, बहुत कुछ झेला है अयोध्या ने…

आज उस अयोध्या की कल्पना की जा सकती है, जिसने 491 वर्षों से एक लंबा वि’वाद झेला। यह सामान्य वि’वाद नहीं था बल्कि दो समुदायों की आस्था को लेकर ट’कराव का कारण था। बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में बने राम मंदिर को 21 मार्च 1528 को तोप से ध्व’स्त कराया था। वैसे तो यह मसला काफी पहले हल हो जाना चाहिए था, लेकिन हालात कळ्छ ऐसे बने कि बात बि’गड़ती ही गई। प्रयास अनेक किए गए, लेकिन कोई भी पक्ष पूरे से कम पर राजी नहीं हुआ।यह कहानी है भारतीय जन मानस में आस्था के केंद्र श्रीराम की जन्मभूमि की। भगवान राम के स्वधाम गमन के बाद सरयू में आई भी’षण बा’ढ़ से अयोध्या की भव्य विरासत को काफी क्ष’ति पहुंची थी। भगवान राम के पुत्र कुश ने अयोध्या की विरासत नए सिरे से सहेजने का प्रयास किया और राम जन्मभूमि पर विशाल मंदिर का निर्माण कराया।

युगों के सफर में यह मंदिर और अयोध्या जीर्ण-शीर्ण हुई, तो विक्रमादित्य नाम के शासक ने इसका उद्धार किया। मीर बाकी ने 1528 में जिस मंदिर को तोड़ा था, उसे 57 ई.पू. में युग प्रवर्तक राजाधिराज की उपाधि ग्रहण करने वाले विक्रमादित्य ने ही निर्मित कराया था।डेढ़ सहस्नाब्दि से भी अधिक के सफर में यह मंदिर हिंदुओं की आस्था-अस्मिता का शीर्षस्थ केंद्र रहा। इस पर मध्य काल की शुरुआत से ही संकट मं’डराने लगा। महमूद गजनवी के भांजे सैयद सालार तुर्क ने सत्ता के विस्तार में अयोध्या के क्षेत्र को भी शामिल करने का प्रयास किया। हालांकि 1033 ई. में राजा सुहेलदेव ने बहराइच में उसे मा’र कर इस आ’तंक से मुक्ति दिलाई। 1440 ई. में जौनपुर के शर्की शासक महमूद शाह के शासन क्षेत्र में अयोध्या के भी शामिल होने का उल्लेख मिलता है।

इसके बावजूद अयोध्या के अनुरागियों की रगों में राम मंदिर ध्वंस के प्रतिकार की ताकत बची थी।पारंपरिक स्रोतों से प्राप्त इतिहास के अनुसार राम मंदिर की वापसी के लिए 76 युद्ध लड़े गए। एकाध बार ऐसा भी हुआ, जब वि’वादित स्थल पर मंदिर के दावेदार राजाओं-ल’ड़ाकों ने कुछ समय के लिए उसे हासिल भी किया पर यह स्थाई नहीं रह सका।जिस वर्ष मंदिर तोड़ा गया, उसी वर्ष पास की भीटी रियासत के राजा महताब सिंह, हंसवर रियासत के राजा रणविजय सिंह, रानी जयराज कुंवरि, राजगुरु पं. देवीदीन पांडेय आदि के नेतृत्व में मंदिर की मुक्ति के लिए जवाबी सैन्य अभियान छेड़ा गया। शाही सेना को उन्होंने विचलित जरूर किया पर पार नहीं पा सके। 1530 से 1556 ई. के मध्य हुमायूं एवं शेरशाह के शासनकाल में 10 युद्धों का उल्लेख मिलता है।हिंदुओं की ओर से इन युद्धों का नेतृत्व हंसवर की रानी जयराज कुंवरि एवं स्वामी महेशानंद ने किया। रानी स्त्री सेना का और महेशानंद साधु सेना का नेतृत्व करते थे।

इन युद्धों की प्रबलता का अंदाजा रानी और महेशानंद के साथ उनके सैनिकों की श’हादत से लगाया जा सकता है। 1556 से 1605 ई. के बीच अकबर के शासनकाल में 20 युद्धों का जिक्र मिलता है। इन युद्धों में अयोध्या के ही संत बलरामाचार्य बराबर सेनापति के रूप में ल’ड़ते रहे और अंत में वीरगति प्राप्त की। इन युद्धों का परिणाम रहा कि अकबर को इस ओर ध्यान देने के लिए विवश होना पड़ा।उसने बीरबल और टोडरमल की राय से बाबरी मस्जिद के सामने चबूतरे पर राम मंदिर बनाने की इजाजत दी। अकबर के ही वंशज औरंगजेब की नीतियां कट्टरवादी थीं और इसका मंदिर-मस्जिद विवाद पर भी असर पड़ा। 1658 से 1707 ई. के मध्य उसके शासनकाल में राम मंदिर के लिए 30 बार यु’द्ध हुए।

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