मुजफ्फरपुर : कोरोना महामा”री के कारण देश में हुए लॉकडाउन ने सैकड़ों लोगों की जिंदगी बदल दी। कई लोगों को ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ी कर दी है, जहा से उन्हें न आगे का रास्ता मिल रहा है न पीछे लौटने की हिम्मत हो रही है। ऐसे में इनके सामने जटिल परिस्थिति आ खड़ी हुई है। लॉकडाउन के चलते सपरिवार घर तो आ गए, मगर रोजगार छिन जाने से इनके सामने विकट परिस्थिति खड़ी हो गई है। शुरुआत तो आस-पड़ोस के लोगों से उधार माग कर की, मगर अब जब लॉकडाउन लंबा चला तो कर्ज लेने की नौबत आ गई। इस कर्ज को की भरपाई के लिए कुछ लोगों ने तो अपना धंधा भी शुरू करने की कोशिश की, मगर गाव के वातावरण से परिचित नहीं होने के चलते धंधा भी फेल गया। ऐसे ही परिवारों की सूची में शामिल है मड़वन प्रखंड के मंसूरपुर चमरूआ निवासी गंजुल हुसैन का परिवार जो चार बच्चों के साथ मदनपुर खादर दिल्ली में रहते थे। वहा अपनी गाड़ी चला कर परिवार का भरण पोषण करते थे। बच्चों की पढ़ाई अच्छे स्कूलों में चल रही थी । इनकी एक बच्ची व 3 लड़का दिल्ली के विभिन्न विद्यालयों में पढ़ रहे थे। बच्चों की दिल्ली की पढ़ाई छुड़ाना गंजूल हुसैन को रास नहीं आ रहा है। यहां के विद्यालयों का शैक्षणिक माहौल भी तो वहां जैसा नहीं है। गंजूल कहते हैं कि परिवार चलाने व बच्चों की पढ़ाई के लिए तो हर हाल में जाना ही पड़ेगा। उन्होंने कहा कि मैंने इस दौरान प्रदेश में ही गाड़ी चलाने का प्रयास किया, मगर सफलता नहीं मिली।

यहा के नियम कानून के अनुसार चलना मुश्किल हो रहा है, मगर फिलहाल किसी तरह गुजारा कर रहा हूं। मगर, जैसे ही स्कूल खुलेंगे हर हाल में जाऊंगा। इसी तरह दिल्ली के शास्त्री नगर में सपरिवार रह रहे मड़वन के खलीलपुर निवासी अरुण कुमार सिंह का दिल्ली में कपड़े का अच्छा खासा व्यवसाय था। वहीं, डीएवी अशोकनगर में तीन बच्चों की पढ़ाई अच्छी तरह चल रही थी। मगर, कोरोना महामारी व लॉकडाउन के चलते पहले तो बच्चों की पढ़ाई बंद हुई, फिर व्यवसाय भी बंद हो गया। ऐसे में दिल्ली में रहने का कोई औचित्य नहीं दिखा तो गाव आ गए। मगर, यहा भी कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। अरुण ने बताया कि अब बाहर जाने की इच्छा नहीं हो रही है। सोचता हूं यही व्यवसाय करूं और किसी तरह अपना और बच्चों का गुजारा करूं?। मगर, बच्चों की पढ़ाई जो दिल्ली में निरंतर जारी थी, वह बाधित होने का भय सता रहा है। इस परिस्थिति में माध्यमिक शिक्षा तक तो किसी तरह दिल्ली जाना ही पड़ेगा। मगर, जब तक महामारी का असर कम नहीं होता, हर हाल में नहीं जाऊंगा। फिर अगर विशेष परिस्थिति आई व स्कूल खुल गए तो बच्चों को भेजूंगा। और खुद यही कोई व्यवसाय करूंगा। उन्होंने अनिश्चितता व्यक्त करते हुए कहा कि देखिए क्या होता है। उन्होंने बताया कि फिलहाल यहीं रोजगार का अवसर तलाश रहा हूं। इसी तरह जीयन निवासी मो आदाब जो राजस्थान में कारपेंटर का कार्य करते थे। लॉकडाउन में कंपनी बंद हो गई और घर आ गए। अब बच्चों की पढ़ाई भी बाधित है। कर्ज लेकर गुजारा करना पड़ रहा है। मो आदाब बताते हैं कि साहब बाहर कौन जाना चाहता है। घर पर अपने परिवार, समाज और आसपास के लोगों को छोड़ बाहर रहना किसे अच्छा लगता है। मगर, परिवार की परवरिश, बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता के प्रति कर्तव्य आदि को लेकर बाहर जाना मजबूरी है। उन्होंने बताया कि कंपनी जैसे ही खुलेगी हर हाल में जाऊंगा। क्योंकि प्रदेश में न वैसा रोजगार है, न वैसा पैसा मिलता है, न ही वहा के फैक्ट्री में दी जाने वाली सुविधा ही यहा प्राप्त है। ऐसे में महामारी का असर कम होते ही लौट जाऊंगा।

प्रदेश से आए मजदूरों को मनरेगा सहित प्रखंड की विभिन्न योजनाओं में काम दिया जाएगा। फिलहाल मनरेगा का छिटपुट कार्य चल रहा है। वहीं, प्रखंड स्तर से योजनाओं का क्रियान्वयन फिलहाल नहीं चल रहा है। जैसे ही कार्य संचालित होगा मजदूरों को काम दिया जाएगा।
अरशद रजा खान
बीडीओ, मड़वन।



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