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कोरोना जा जा जा, कोरोना जा जा जा…पहली विजय की पहली चिट्ठी मालिक को दे आ, कोरोना जा जा जा… – देवेंद्र प्रसाद सिंह

कोरोना जा जा जा…..

बतंगड़
देवेंद्र प्रसाद सिंह

कोरोना जा जा जा ,कोरोना जा जा जा
पहली विजय की पहली चिट्ठी मालिक को दे आ
कोरोना जा जा जा….

भाई कोरोना, बहुत काम कर लिये भारत में, अब अपनी सफलता की पहली सूचना अपने मालिक को जाकर दे आओ। दूसरे देश में ज्यादा दिनों तक नहीं रहते। हमारे यहां ऐसे तो अतिथि के न आने का समय होता है और न जाने का। लेकिन अतिथि अगर ठहर गया तो एक से दो दिनों के बाद उसके स्वागत-सत्कार में कटौती की जाने लगती है। एक समय ऐसा भी आता है जब अतिथि से गृहस्वामी टहल टिकोले भी कराने लगता है। इसलिए जिन्हें अपना मान-सम्मान प्यारा होता है, वे किसी दूसरे के घर मेहमान बनकर ज्यादा दिनों तक नहीं रहते। और तुम तो बिना वीजा पासपोर्ट के भारत में आ धमके हो, ऐसे भी तुम्हारा स्वागत करने को हेल्थ विभाग के लोग और पुलिस वाले तुम्हें सैनिटाज़र और डंडे लेकर खोज रहे हैं। एक माह से ज्यादा समय तुम्हें भारत में आये हुए हो गये, इज्जत से चले जाओ नहीं तो यहां गरदनिया पासपोर्ट भी बनता है।

हुलकाया हुआ कुत्ता भी ज्यादा दूज तक नहीं दौड़ता । लक्ष्य तक जाकर तुरंत भाग आता है।तुम भी तो हुलकाया हुआ कुत्ता ही ठहरा, इसलिए जल्दी निकल लो। कभी शान से आना समंदर किनारे ले चलेंगे मौजों से खेलने। डूबने का शौक होगा तो आराम से डूब मरना। हमारे यहां उसे जल समाधि कहते हैं।
अभी तुरंत निकल लो मालिक के यहां जाने के लिए। मालिक को बताना – बाप रे , वहां बड़ी गर्मी है। मालिक मेरे, आपके आदेश का भरपूर पालन किया है। हज़ार लोगों को अपना शिकार बनाया, ७०० लोगों को निगल भी लिया। लेकिन क्या बताएं मालिक, ये भारत वाले होते बड़े जीवट हैं । १०० को पकड़ता हूँ तो ३-४ को ही अपना निवाला बना पाता हूँ। सब ठीक होकर घर चले जाते हैं। दिल्ली, मुंबई, केरला ने तो हमारा जबरदस्त स्वागत किया। लालू के राज्य बिहार भी गया था। मेरे मालिक, गजब का होता है बिहारी। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, कोलकाता से पैदल ही चला आया गॉंव । रोटी- मट्ठा खाके इतना तंदुरुस्त है कि मेरे दंश का उसपर कोई असर ही नहीं होता। फिर भी ६०-६५ को मैंने लोटा दिया है। रवींद्रनाथ टैगोर के बंगाल भी गया था, मन हुआ कि थोड़े दिन यहां रुक जाऊं, कुछ लोग बड़े अच्छे मिले , दिल्ली वाले भाइयों की तरह, अपने मोहल्ले में आश्रय देने को भी तैयार थे लेकिन केंद्र का दूत वहां भी पहुँच गया।

मोहल्ले-मोहल्ले ढूंढ रहा है। पर दीदी अच्छी हैं।वो तो भला हो दिल्ली वाले टूरिस्ट वीजा पर धर्म प्रचार करने वाले भाइयों का कि पूरे देश की सैर कर ली। बांकी तो हर प्रदेश और जिलों की सीमा पर पुलिस, डॉक्टर और मजिस्ट्रेट बैरिकेडिंग डालकर मुझे खोज रहे हैं। पूरे देश में लॉकडाउन है। क्वारेंटीन, आइसोलेशन और पता नहीं क्या-क्या शब्द गढ़े हैं मेरे लिए। देश के ७७-७८ ज़िलों से मुझे खदेड़ दिया गया है। मुंह छिपाता फिर रहा हूँ। भाई लोगों का कोई मोहल्ला मिल जाता है तो टिक जाता हूँ, वर्ना अब यहां रहना दुश्वार हो गया है। मुझे बुला लो मेरे आका ! कहीं कोई सटने देने को तैयार नहीं। पब्लिक नाक- मुंह बांधकर घूम रही है। नीचे लंगोट पहन रही है। जल्दी दाल-पानी यहां से समाप्त होने वाला है। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूँ । अब किसी दूसरे मुल्क का असाइनमेंट मुझे दे दे आका। अथवा अपने देश वाले लेबोरेट्री के ठन्डे घर में ही पहले की तरह बंद कर दे। वहीँ पड़ा रहूँगा।
सादर
आपका अपना कोरोनावायरस।

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