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दरभंगा का एक ऐसा आश्रम जो गवाह हैं आजादी का:कभी आजादी के मसीहों का था गुप्त शरण स्थल

भारत की स्वतंत्रता आंदोलन की भूमिका में दरभंगा के बहेरी प्रखंड स्थित मझौलिया गांव के मगन आश्रम का एक अलग इतिहास है। यह स्वतंत्रता आंदोलन का एक ऐसा केंद्र था। जहां से इस आंदोलन की गतिविधि के लिए कई अहम फैसले लिए गए। यहां की दीवारें उस समय के संघर्ष के कहानी की गवाह है, जो हमारे देश को आजादी दिलाने में अहम स्थान रखता है। यह स्थान गवाह है कि किस तरह राजेंद्र प्रसाद और सरदार वल्लभ भाई पटेल पर जब अंग्रेजों के द्वारा वारंट निकल गया तो इस आश्रम के पीछे के खेत में वह किस तरह छुपे थे।

खंडहर बना मगन आश्रम

खंडहर बना मगन आश्रम

महात्मा गांधी के भतीजे के नाम पर रखा गया मगन आश्रम

मझौलिया गांव में इस आश्रम की शुरुआत 1929 में फूस के घर में हुई थी। महात्मा गांधी के शिष्य रहे पंडित रामानंद मिश्रा व उनकी पत्नी राज किशोरी देवी ने इस स्थल की स्थापना किये थे। ये आश्रम साबरमती आश्रम की सह शाखा के रूप में स्वाधीनता संग्राम को मार्गदर्शन देने के साथ ही गति प्रदान करता रहा। इस आश्रम की स्थापना के बाद इस इलाके में अंग्रेजी हुकूमत के अंदर डर पैदा हो गया था।

1930 में अंग्रेजों ने लगा थी आग

1930 में पंडित रामानंद मिश्रा को गिरफ्तार करते हुए, अंग्रेजों ने मगन आश्रम में आग लगा दी और इसको तहस-नहस कर दिया। इसके बाद आजादी के आंदोलन की ज्वाला और भड़क उठी। इस आश्रम का नाम महात्मा गांधी के भतीजे मगनलाल कुशालचंद गांधी के नाम पर मगन आश्रम रखा गया था।

आजादी के आंदोलन के समय में महात्मा गांधी ने अपने भतीजे को आजादी की रणनीति बनाने के लिए इस आश्रम भेजा था। लेकिन रास्ते में आते वक्त पटना में उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनकी याद में इस आश्रम का नाम मगन आश्रम रखा गया। अंग्रेजों के तहस-नस कर देने के बाद इस आश्रम को ग्रामीणों ने फिर से जीवित किया।

अब सरकार को कोई सुध नहीं

लेकिन आज जब देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। तस्वीर बता रही है इसकी दायिनी यह स्थिति है। आजादी के आंदोलन की गवाह बनी इस जगह के प्रति किसी सरकार का कोई मोह नहीं है।

इस गांव के ग्रामीण कमलेंद्र झा बताते हैं कि पटना में गांधी जी के भतीजे के मौत के बाद यहां के ग्रामीणों ने अपने निजी स्तर से जमीन को डोनेट कर इस आश्रम की स्थापना की थी। इसके बाद या आश्रम अंग्रेजों के लिए सर दर्द बन गया और अंग्रेजों ने इसमें आज लगवा दी। इसके बाद पुनः ग्रामीणों की मदद से इसे बनाया गया। आगे उन्होंने बताया कि 1942 के आंदोलन में जब रेलवे लाइन को जब रोका गया था और पूरा उखाड़ आ गया था। उस समय में कुछ आंदोलनकारियों पर वारंट निकाला गया था और उनके छुपने का जगह उस वक्त यही हुआ करता था। जिसमें राजेंद्र प्रसाद आचार्य कृपलानी सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नमकीन चेहरे हुआ करते थे। उन्होंने आगे बताया कि इनको छुपने के लिए पीछे गन्ने के खेत में एक झोपड़ी बनाया गया था।

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