स्वच्छ जल की संकेतक डॉल्फिन्स अब पूरे देश में मात्र 3000 ही बची हैं। डॉल्फिन्स की आधी संख्या बिहार के गंगा नदी में पाई जाती है। आए दिन डॉल्फिन की संख्या घटती जा रही है। अभी हाल ही में 72 घंटे के भीतर 2 डॉल्फिन की चोट लगने से मौत होने की तस्वीर वायरल हुई थी।
एक वक्त था जब पटना के किसी घाट से या नाव से सवारी करते हुए डॉल्फिन दिख जाया करती थीं। साल 2012 में पटना की गंगा में डॉल्फिन की अटखेलियां करते हुए वीडियो सामने आई थी। वहीं, अब पटना के गंगा नदी में डॉल्फिन्स नहीं दिखती। अब सवाल यह है पटना की डॉल्फिन कहां गई ? गई तो आख़िर क्यों ? क्या पटना की गंगा में डॉल्फिन के वापसी के आसार हैं ?
यही सवाल जब भास्कर की टीम ने डॉल्फिन मैन ऑफ इंडिया कहे जाने वाले आरके सिन्हा से पूछे तो उन्होंने कहा कि पटना में गंगा है कहां, वो तो वर्चुअली डेड हो गई है। अब जब डॉल्फिन का आवास ही नहीं बचा तो वो दिखाई कैसे देंगी।
इधर सवालों के जवाब तलाशते हम गंगा नदी के किनारे पहुंचे तो वहां सिर्फ बड़ी बड़ी मशीनें ही दिखाई दे रही थीं। हर तरफ खुदाई का काम चल रहा था। एक वक्त था जब खुद नीतीश कुमार गंगा में बढ़ते प्रदूषण व गाद को लेकर चिंता व्यक्त करते थे। आज एक दशक बाद हालत अलग हैं। जिन मछुआरों को वह डॉल्फिन संरक्षण के लिए अहम माना जाता था वो खुद कह रहे हैं कि पटना में डॉल्फिन अब नहीं दिखती।

पटना के गंगा में लगातार निर्माण कार्य चल रहा है।
पटना की गंगा में अब नहीं दिखती डॉल्फिन
हमारी टीम ने इस बारे में गंगा किनारे मौजूद नाविक बिट्टू कुमार से बात की तो उन्होंने बताया कि अब हमें नदी में डॉल्फिन्स नहीं दिखतीं। कुछ साल पहले जब नदी में पानी का बहाव तेज था, तब दिन-रात डॉल्फिन्स उछलते हुए दिखती थीं। अब बस बीच में थोड़ा बहुत ही पानी दिखता है। पानी इधर काफी कम हो गया है। अब पहले जैसी धारा भी नहीं बहती।
साथ ही नदी में पुल का काम चल रहा है। खुदाई के लिए इतनी बड़ी-बड़ी मशीनें लगा दी गई हैं। नदी में मिट्टी भी भरा जा रहा है, तो डॉल्फिन को भी दिक्कत हो गई है और वह बाढ़-मोकामा के इलाके में दिखाई देती हैं, लेकिन इधर नहीं।
दूसरे नाविक रौशन यादव ने बताया कि काफी वक्त से पटना के गंगा नदी में डॉल्फिन्स नहीं दिखी हैं। लगातार नदी में मिट्टी भरी जा रही है। बड़ी-बड़ी मशीनों का शोर गुल, पानी का लेवल भी कम होता जा रहा है। ऐसे हालात में डॉल्फिन कहां से दिखेंगी।
पटना के पास डेड हो गई है गंगा
जब हमने डॉल्फिनस के संरक्षण के बारे में आरके सिन्हा से बात की तो उन्होंने बताया की डॉल्फिन का संरक्षण तो हो रहा है लेकिन पटना के पास में गंगा में डॉल्फिन इसलिए नहीं दिखाई दे रही है कि क्योंकि गंगा पटना से काफी दूर हो गई है। कई धाराओं में बंट गई है। उसके बाद गंगा किनारे केवल नाले का पानी ही दिखाई पड़ता है। इसके कारण मछलियां नहीं हैं। डॉल्फिन का भोजन भी तो मछली ही है। जब मछलियां ही नहीं होंगी तो डॉल्फिन कहां और कैसे रहेगी?
नदी में कंस्ट्रक्शन का काम और मरीन ड्राइव है डॉल्फिन्स के विलुप्त होने का कारण
‘दी गंगेटिक डॉल्फिन’ किताब लिख चुके आरके सिन्हा ने कहा कि डॉल्फिन का जिस नदी में उचित वास स्थान होता है उस नदी में घुमाव होना चाहिए, संगम होना चाहिए, गहराई होनी चाहिए, सैलो भी होना चाहिए। यानी कुल मिलाकर कॉम्प्लेक्स जिओ मोरफोलॉजिकल करैक्टेरिस्टिक्स नदी का होना चाहिए। ऐसी जगहों पर ही डॉल्फिन्स रहेंगी। अब पटना से सटी गंगा नदी में यह सब कैरेक्टरिस्टिक नहीं बचा है।
बाढ़, मोकामा, मुंगेर और भागलपुर में अभी भी उस तरह की जिओ मोरफोलॉजिकल कॉम्प्लेक्सिटी है तो डॉल्फिन वहां चली गई हैं। पटना के गंगा नदी में इतना कंस्ट्रक्शन हुआ है। वर्ल्ड बैंक के 272 करोड़ की लागत से रिवरफ्रंट डेवलपमेंट हुआ। मरीन ड्राइव बना लेकिन इन सब निर्माण में डॉल्फिन पर क्या असर पड़ा ये कोई नहीं देख रहा है।




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