मुजफ्फरपुर: विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर आमगोला स्थित शुभानंदी के सभागार में नवसंचेतन मुजफ्फरपुर तथा निर्माण रंगमंच हाजीपुर के संयुक्त तत्वावधान में रंगमंच दशा और दिशा पर विमर्श के साथ ही दो एकल नाट्य प्रस्तुतियां हुई।

अध्यक्ष उद्गार में डॉ संजय पंकज ने कहा कि आज सिनेमा देखने की भी प्रवृत्ति कम गई है जब की रंगमंच की उपयोगिता और सार्थकता बहुत हद तक बची हुई है। इसका सीधा प्रभाव दर्शकों पर पड़ता है। बिहार की सांस्कृतिक राजधानी मुजफ्फरपुर रंगमंच की दृष्टि से संपन्न होते हुए भी प्रेक्षागृह के अभाव में यहां के कलाकारों के द्वारा लगातार नाट्य प्रस्तुतियां नहीं हो पाती हैं।


जनप्रतिनिधि, प्रशासन और सरकार से हमारी मांग है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाया जाए। संस्कृति मनुष्य, समाज, जनपद और राष्ट्र की पहचान होती है।

रंगमंच के जिंदा रहने का अर्थ है कि जिंदगी में ताजगी और ऊर्जा बची हुई है। हाजीपुर से आए हुए जाने-माने रंगकर्मी क्षितिज प्रकाश ने कहा कि कोई जरूरी नहीं कि हमें बड़ा रंगमंच अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए मिले।

हम चौक चौराहे से लेकर कुछेक लोगों के बीच भी नाटक प्रस्तुत कर सकते हैं। हमारी कोशिश लगातार होनी चाहिए। यशवंत पराशर ने कहा कि रंगमंच की संस्कृति अगर बनी रहे तो दर्शकों का आकर्षण कम नहीं होगा। संजीव साहू ने कहा कि मुजफ्फरपुर रंगमंच के क्षेत्र में अपनी पहचान रखता है।

वयोश्रेष्ठ एचएल गुप्ता, मुकेश त्रिपाठी, अविनाश तिरंगा, राजीव कुमार, कुमार विरल, रमेश रत्नाकर,मधुमंगल ठाकुर, हरिकिशोर प्रसाद सिंह, प्रणय कुमार, डॉ केशव किशोर कनक, इम्ब्रान, अमीर हम्ज़ा, दीनबंधु, चैतन्य चेतन, कृशानु आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए और मुजफ्फरपुर में नाट्य प्रस्तुति का सिलसिला शुरू हो इसके लिए हर सहयोग देने का विश्वास दिलाया।

यशवंत और पवन ने अपनी एकल नाट्य प्रस्तुति से सभी को प्रभावित किया। संचालन सुमन वृक्ष ने, स्वागत और धन्यवाद ज्ञापन प्रमोद आजाद ने किया।




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