मसौढ़ी : आज धनतेरस के साथ दिपावली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरूआत हो रही है. दीपावली को लेकर घरों में जोर शोर से तैयारियां चल रही है. वहीं खासकर बाजारों में काफी रौनक हैं. बाजार जहां रंग-बिरंगे दीयों और रौशनी के सामानों से गुलजार है. इस बीच दीपावली पर डायन दीया की भी भारी मांग है. इस दीये को लेकर पौराणिक मान्यता है कि डायन दीया जलाने से घर के चारों ओर सुरक्षा कवच बनता है, जो कि बुरी शक्तियों को घर में प्रवेश नहीं करने देता.

घर की चौखट पर डायन दिया जलाने की पुरानी परंपरा
दीपावली में घर की चौखट पर डायन दिया जलाने की पुरानी परंपरा रही है.दीपावली को लेकर कई मान्यताएं और परंपरा हैं. ऐसे में आज भी गांवों में लोग मिट्टी के दीए जलाते हैं और डायन दीया जलाकर बुरी शक्तियों का नाश करते हैं.डायन दीए के बारे में यह मान्यता है कि घरों में इसे जलाने से बुरी शक्तियों का नाश होता है. दीपावली की रात गांव में हर घर के बाहर चौखट पर डायन दीया जलाने की परंपरा है. जिससे बुरी शक्तियां घर के पास भी नहीं फटकती हैं.

कैसा होता है डायन दीया?
डायन दीया एक मिट्टी की महिला आकृति का पुतला होता है जिसमें पांच छोटे-छोटे दीयों को जलाने के लिए स्थान होता है. जो पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करते है पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश. दिवाली की रात को इस दीये को घर के मुख्य दरवाजे पर जलाया जाता है ताकि घर में नकारात्मक शक्तियों ना प्रवेश कर पाएं और घर की सकारात्मक ऊर्जा बनी रहे.

प्रभुराम के अयोध्या लौटने पर स्वागत में दीपावली मनाने की परंपरा
हर साल दीपावली का त्योंहार धूमधाम से मनाया जाता हैं. जिसे लेकर घरों में दस दिन पहले से लोग साफ-सफाई में लग जाते हैं. साथ ही दीपावली आते ही दीए और रंग-बिरंगे लाइटों से घरों को सजाते हैं. इसके पीछे ये मान्यता कि भगवान श्री राम 14 वर्ष का वनवास खत्म कर अपने घर अयोध्या लौटे थें. तब उनके स्वागत को लेकर पूरे अयोध्या को दीपो से सजा दिया गया था.

आमावस्या के अंधकार को दूर करता है दीपोत्सव
साथ ही डायन का दिया को लेकर ये भी मान्यता है कि दिवाली आमावस्या की रात होने की वजह से चारों ओर गहरा अंधकार होता है और उस वक्त कई बुरी शक्तियां भी गतिमान रहती है ऐसे में हर घर के लोग अपने घर के बाहर डायन दीया जलाते हैं ताकि घर में बुरी शक्तियों का प्रवेश नहीं हो सके. इस परंपरा को आज भी गांवों में मनाया जाता हैं.




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