गया : बिहार में गया जी की धरती एक बार फिर पितरों की याद में आस्था के सैलाब से भरने वाली है. इस साल पितृपक्ष मेला आज से शुरू होकर 21 सितंबर तक चलेगा. खास बात यह है कि आश्विन कृष्ण षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध एक ही दिन पड़ने के कारण यह मेला 17 नहीं बल्कि 16 दिनों का होगा.
पितृ ऋण से उऋण होने का पर्व
पितृपक्ष को पितृ ऋण से उऋण होने का पर्व माना जाता है. मान्यता है कि इस दौरान पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है. गया जी इसी वजह से मोक्ष नगरी के नाम से विख्यात है.

इस बार 16 दिन का होगा मेला
आश्विन कृष्ण षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध 13 सितंबर को एक ही तिथि में पड़ रहा है. यही कारण है कि इस बार पितृपक्ष मेला 16 दिनों का होगा. यह 6 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक चलेगा.
श्राद्ध की तिथियां तय
6 सितंबर को भाद्र शुक्ल चतुर्दशी से मेला शुरू होगा और 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा. इन दिनों में प्रतिदिन अलग-अलग तीर्थस्थलों पर पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण की परंपरा निभाई जाएगी.

कहां और कैसे होता है पिंडदान
पितृपक्ष में पुनपुन तट, फल्गु नदी, ब्रह्म कुंड, प्रेत शिला, रामशिला, सीता कुंड, विष्णुपद मंदिर समेत कई पवित्र स्थलों पर पिंडदान किया जाता है. हर दिन अलग-अलग वेदियों और कुंडों पर आचार्यों के निर्देशन में पिंडदान और तर्पण का विधान है.

15 लाख से अधिक तीर्थयात्रियों की उम्मीद
इस बार पितृपक्ष मेले में 15 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है. देश ही नहीं, विदेशों से भी पिंडदानी अपने पूर्वजों के मोक्ष की कामना को लेकर यहां पहुंचते हैं.

पितरों के झूमने की मान्यता
मान्यता है कि जैसे ही पितृपक्ष मेला शुरू होता है, पितर गया जी में पहुंच जाते हैं. अपने वंशज को देखकर वे प्रसन्न होकर झूमने लगते हैं. यही वजह है कि इस पखवाड़े को मोक्ष का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है.

धरोहर है यह परंपरा
गया जी का पितृपक्ष मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि सदियों पुरानी परंपरा को भी जीवित रखता है. यहां पीढ़ियों से लोग पिंडदान करने आते रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यह परंपरा एक धरोहर बन चुकी है.



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