MUZAFFARPUR

AIIMS पटना में डॉक्टरों की बगावत, न ओपीडी खुली, न इमरजेंसी, डॉक्टरों की हड़ताल छठे दिन भी जारी, मरीजों की तड़प बेबस प्रशासन

पटना : राजधानी पटना का एम्स, जहां आम दिनों में जीवन को नया आसरा मिलता है, आज वही अस्पताल सियासत और संघर्ष की आग में जल रहा है। डॉक्टरों की हड़ताल ने छठे दिन भी थमने का नाम नहीं लिया, और स्थिति अब सिर्फ नाज़ुक नहीं, बल्कि गंभीर से भयावह होती जा रही है।

एम्स के रेजिडेंट डॉक्टरों की इस हड़ताल ने न सिर्फ ओपीडी और इमरजेंसी सेवाओं को ठप कर दिया है, बल्कि आसपास के मेडिकल संस्थानों को भी आंदोलित कर दिया है। आईजीआईएमएस सहित अन्य मेडिकल कॉलेजों के जूनियर डॉक्टरों ने समर्थन में उतरते हुए ओपीडी बहिष्कार की चेतावनी दे दी है।

ज़ाहिर है, यह आंदोलन अब किसी एक अस्पताल की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे चिकित्सा जगत की आवाज़ बनता जा रहा है।मंगलवार को हालात इतने बिगड़ गए कि पटना के आईजी और एसपी सिटी को एम्स परिसर पहुंचकर डॉक्टरों से काम पर लौटने की अपील करनी पड़ी। मगर डॉक्टरों ने दो टूक कह दिया कि जब तक विधायक चेतन आनंद के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस नहीं ली जाती, वे मरीजों का इलाज नहीं करेंगे।

वहीं चेतन आनंद भी सुलह-सफ़ाई से इनकार करते दिखे। उनका कहना है कि उनके साथ मारपीट हुई और वे किसी कीमत पर माफ़ी नहीं मांगेंगे। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से भी इस मामले में बात की है। एम्स निदेशक डॉ. सौरभ वार्ष्णेय ने माना कि डॉक्टरों के बिना अस्पताल की व्यवस्था अधूरी और असहाय है।

उनकी अनुपस्थिति ने अस्पताल को एक खामोश इमारत में तब्दील कर दिया है, जहां रोज़ाना चार हज़ार से अधिक मरीज सिर्फ निराशा और बेबसी लेकर लौट रहे हैं। मंगलवार को करीब 80 ऑपरेशन रद्द किए गए। मरीजों का कहना है कि वे सुबह पांच बजे से कतार में खड़े हैं, और जब नंबर आया, तो डॉक्टर नदारद। एक बुजुर्ग तीमारदार की जुबान से निकले शब्द व्यवस्था की नब्ज को उजागर कर गए कि गलती चाहे किसी की हो, मगर सज़ा हमारे बीमार बच्चों को क्यों मिल रही है?

बता दें 30 जुलाई की रात की घटना ने जहां राजनीति और चिकित्सा व्यवस्था के टकराव को जन्म दिया, वहीं प्रशासन की चुप्पी ने आमजन के आक्रोश को जन्म दे दिया है। डॉक्टरों का आरोप है कि विधायक के गार्ड हथियार लेकर एम्स में घुसे, जिससे विवाद गहराया। वहीं एफआईआर को एकतरफा और धमकीभरा बताया जा रहा है।

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