MUZAFFARPUR

बल, बुद्धि और विद्या के प्रतीक हैं हनुमान जी, गुणों को अपनाकर ‘कौशलयुक्त’ बन सकता है देश

रामभक्त हनुमान को महावीर, बजरंगबली, पवन पुत्र, अंजनेय समेत कई नामों से पुकारा जाता है. हनुमान त्याग और समर्पण के प्रतीक के तौर पर जाने जाते हैं। कहा जाता है की भगवान हनुमान को अमर होने का वरदान प्राप्त हैं।

उनके चारित्रिक गुणों को थोड़ा सा भी उतारकर अपने जीवन को सफल किया जा सकता है। हमारे धर्मशास्त्रों में आत्मज्ञान की साधना के लिए तीन गुणों की अनिवार्यता बतायी गयी है- बल, बुद्धि और विद्या। एक की भी कमी हो तो साधना का उद्देश्य सफल नहीं हो सकता। पहली बात साधना के लिए बल जरूरी है, निर्बल व कायर व्यक्ति साधना का अधिकारी नहीं हो सकता।

दूसरे साधक में बुद्धि और विचार शक्ति होनी चाहिए, इसके बिना साधक पात्रता विकसित नहीं कर पाता और तीसरे विद्या क्योंकि विद्यावान व्यक्ति ही आत्मज्ञान हासिल कर सकता है। महावीर हनुमान के जीवन में इन तीनों ही गुणों का अद्भुत समन्वय मिलता है। इन्हीं गुणों के बल पर जीवन की प्रत्येक कसौटी पर खरे उतरते हैं भक्त शिरोमणि हनुमान।

रामकथा में हनुमान जी का चरित्र इतना प्रखर है कि उन्होंने राम के आदर्शों को गढ़ने में मुख्य कड़ी का काम किया है। रुद्रांश श्री हनुमान ने इस धरती पर भगवान राम की सहायता के लिये अवतार लिया था।

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार महावीर हनुमान का जन्म 58 हजार 112 साल पहले त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सूर्योदय काल में माता अंजना के गर्भ से हुआ था। चूंकि भक्त शिरोमणि हनुमान जी का पूजन कलियुग के जाग्रत देवता के रूप में होता है, इसी कारण प्रति वर्ष चैत्र माह की पूर्णिमा को महावीर हनुमान का जयंती नहीं अपितु जन्मोत्सव मनाया जाता है।

महावीर हनुमान का जीवन हमें यह शिक्षण देता है कि बिना किसी अपेक्षा के सेवा करने से व्यक्ति भक्त ही नहीं, वरन भगवान तक बन सकता है। बलवानों में भी महाबलवान माने जाते हैं महावीर हनुमान।

हनुमान जन्मोत्सव के पावन अवसर पर आइए चर्चा करते हैं महावीर हनुमान के ऐसे विशिष्ट चारित्रिक गुणों की जिनको अपने जीवन में उतार कर देश की युवा पीढ़ी एक सशक्त व संस्कारवान राष्ट्र का निर्माण कर सकती है।

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