समस्तीपुर: बिहार के समस्तीपुर शहर में 25 फरवरी को एक ऐसी बारात निकली, जिसने आधुनिक युग में प्राचीन परंपरा को जीवंत कर दिया. यहां सड़कों पर न तो लग्जरी कारों की कतार दिखी और न ही डीजे की तेज धुनें गूंजीं. इसके बजाय बैलों की सधी हुई चाल और बैलगाड़ियों की मद्धिम चरमराहट के साथ लोक गीतों व सहनाई की मधुर तान सुनाई दी. लोगों ने इस दुर्लभ दृश्य को मोबाइल में कैद किया, क्योंकि यह आधुनिक समय में बैलगाड़ी पर निकली बारात थी.
हर तरफ देसी थीम वाली शादी की चर्चा
इस अनोखी बारात की चर्चा पूरे शहर में छा गई. मगरदही घाट निवासी प्रदीप सेठ के पुत्र आलोक कुमार की शादी रोसड़ा की एक लड़की से तय हुई थी. परिवार ने शादी को पर्यावरण-अनुकूल (Eco-Friendly) बनाने और प्राचीन सभ्यता को अपनाने का फैसला किया. इसी क्रम में 35 बैलगाड़ियों का जत्था तैयार किया गया, जिन्हें खूबसूरती से सजाया गया. बैलगाड़ियों पर लोक गीत बजाने की भी व्यवस्था की गई, जिससे पूरा माहौल पुराने दौर जैसा हो गया.

शाही अंदाज में सजी बैलगाड़ियां और दूल्हे की घोड़ी
बारात में बैलगाड़ियों पर सोफे और गद्दे बिछाए गए थे, जिस पर बैठकर बाराती शाही सवारी का मजा ले रहे थे. दूल्हा आलोक घोड़े पर सवार होकर आगे-आगे चल रहा था. शाम ढलते ही बारात स्वर्ग होटल से निकली और बाजार समिति स्थित गजराज पैलेस की ओर बढ़ी. रास्ते में लोग डांस करते नजर आए, जबकि बैलगाड़ियों पर बैठे बाराती इस अनोखे अनुभव का लुत्फ उठा रहे थे. गजराज पैलेस पहुंचते ही हर किसी की जुबान पर इस प्राचीन शैली वाली शादी की तारीफ थी.
प्रदूषण मुक्त बारात का संदेश
महेंद्र प्रधान ने जोर दिया कि वाहनों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण फैलाता है, लेकिन बैलगाड़ी वाली बारात पूरी तरह प्रदूषण मुक्त थी. करोड़ों की कारों वाली बारातों को लोग नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन इस बारात को देखने के लिए भारी भीड़ जुट गई. लोगों ने मोबाइल से वीडियो बनाए और सोशल मीडिया पर शेयर किए. कुल 35 बैलगाड़ियों में 70 बैल जुते थे, जो इस आयोजन की भव्यता को दर्शाता है.

लोगों में पुराने दौर की यादें ताजा
बारात देखने वाले लोगों ने कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे 80 के दशक का दौर लौट आया हो. रामाशीष राय जैसे गाड़ीवान ने उत्साह से बताया, “बारात जा रही है, प्रधान जी के यहां बैलगाड़ी से बारात जा रही है. जमाना बीत गया, लेकिन एक बार फिर वो दौर लौट आया है.” शहरवासियों ने खुद को प्राचीन काल में पहुंचा हुआ महसूस किया.

पर्यावरण और संस्कृति का अनूठा मेल
यह बारात न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही थी, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत को भी मजबूत कर रही थी. आलोक और उनके परिवार का यह प्रयास दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया है. ऐसे आयोजन आधुनिकता के बीच परंपराओं को जीवित रखने का बेहतरीन उदाहरण हैं.




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