कटिहार में बाढ़ कटाव और इससे उपजी विस्थापन की समस्या दशकों पुरानी है। कटिहार जिला गंगा, कोशी, महानंदा नदियों से घिरा हुआ है। कुरसेला से अमदाबाद पश्चिम बंगाल की सीमा तक भीषण बाढ़ के कारण कटाव का कहर वरपा है। महानंदा नदी का प्रकोप बारसोई, बलरामपुर, कदवा, प्राणपुर , आजमनगर प्रखंड क्षेत्र दशकों से झेलता रहा है।
कालंतर मे इस क्षेत्र को प्रलयकारी बाढ़, व कटाव के कहर से बचाने के लिए क्षेत्र के प्रखर समाजवादी नेता बाबू युवराज सिंह की पहल पर सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबू चन्द्रशेखर सिंह ने तकरीबन आधा दर्जन कटावरोधी नोज का निर्माण गुआगाछी गांव के पास से चौकचामा, नौरसिया क्षेत्र तक कराया था, लेकिन नदियों की बेगवती धारा और भीषण कटाव के कारण एक एक कर सभी नदी में समा गए।
पलायन करने को विवश लोग
दशकों से इन नदियों द्वारा बाढ़ कटाव के कारण हजारों बीघा कृष भूमि कटावग्रस्त हो जाने से कृषि पर आधारित आबादी मजदूरी करने को विवश हो गया। वर्षों से व्यवस्थित गांव नदी में विलीन हो जाने से व्यवस्थित समाज का तानाबाना बिखर गया। बाढ़ कटाव से विस्थापित परिवार सुरक्षित ठिकानों की खोज मे अन्यत्र पलायन कर गये।रोजी रोजगार की तलाश मे अनेक पीड़ित परिवार अन्य प्रदेशों की ओर निकल गए।
बाढ़ के कारण बर्बाद हो जाता है फसल
आज भी प्रत्येक वर्ष की प्रलयकारी बाढ़ कटाव के कारण लोगों की फसल तवाह होती है, आशियाने बाढ़ की विनाशलीला मे बह जाती है। ऐसे मे सरकार की मुट्ठीभर अनाज व राहत के सहारे महीनों गुजारने की विवशता होती है। आज भी बाढ़ कटाव से विस्थापित परिवार दशकों से पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं। अनेक विस्थापित परिवार सड़क किनारे, बांध, रेल लाईन के किनारे, खाली पड़ ऊची सरकारी भूमि, क्वाटर मे पनाह ले रखी है। मनिहारी कारीकोशीबांध पर हरिप्रसाद मधारी चौक के समीप मवेशी बांधनेवाली घर मे अपनी मवेशी के



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