बिहार में जाति आधारित गणना 7 फरवरी से शुरू हो रही है। इसकी पूरी तैयारी सरकारी स्तर पर कर ली गई है। इसमें बड़ी संख्या में स्कूली शिक्षकों को सरकार ने लगाया है। आदेश यह है कि स्कूल में पूरे समय बच्चों को पढ़ाने के बाद शिक्षक गणना का कार्य भी निबटाएंगे। यानी शिक्षक सुबह साढ़े 9 बजे से लेकर 4 बजे तक बच्चों को स्कूल में शिक्षा देंगे और उसके बाद 4 बजे शाम से जनगणना कार्य में लगेंगे। तर्क यह दिया जा रहा है कि चूंकि गणना कार्य के लिए शिक्षकों को अलग से राशि दी जा रही है, इसलिए उन्हें स्कूल में पूरे समय बच्चों को पढ़ाने के बाद कार्य करना होगा।
इस फरमान से कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। साथ ही विरोध भी हो रहा है। सरकार को समर्थन दे रही पार्टी भाकपा-माले ने जाति आधारित गणना का समर्थन तो किया है, लेकिन शिक्षकों को इस कार्य में लगाने का विरोध किया है। नीतीश-तेजस्वी सरकार में मंत्रिमंडल में शामिल पार्टी कांग्रेस ने भी शिक्षकों को इस तरह से जाति आधारित गणना कार्य में लगाने का विरोध किया है। बिहार में शिक्षकों के बड़े संगठन ‘टीईटी-एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ गोपगुट’ ने भी इसका विरोध किया है।
शिक्षकों की ओर से उठाए जा रहे 5 सवाल
- सरकार के यहां कर्मियों के लिए कार्य के घंटे का निर्धारण है कि नहीं?
- 8 घंटे तक स्कूल में पढ़ाने के बाद क्या शिक्षकों के अंदर इतनी एनर्जी बचेगी कि वे गणना कार्य निबटा पाएंगे?
- जाति आधारित गणना एक दिन का काम नहीं है कि ओवरटाइम करा लिया जाए। यह कई दिनों तक चलेगा। ऐसे में स्कूलों में पढ़ाने के साथ गणना कराने का काम कितना मानवीय है?
- सरकार ने पिछले 10-12 वर्षों से नियोजित शिक्षकों का ट्रांसफर नहीं किया है। इसमें लगभग आधी संख्या महिला शिक्षकों की है। कई शिक्षिकाएं कई किमी की दूरी तय कर कार्य स्थल पर आती हैं। इसमें कई दिव्यांग भी हैं, जिनका ट्रांसफर नहीं हो रहा। ऐसे शिक्षकों को भी परेशानी होगी।
- जाति आधारित गणना कार्य में जिन शिक्षकों को लगाया गया है, उनमें से ज्यादातर को स्कूल के निकट का क्षेत्र जनगणना कार्य के लिए नहीं दिया गया है।



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