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कोरोना का क’हर: दो बच्चों व पति के साथ 700 किलोमीटर पैदल चल बक्सर पहुंची महिला, तीसरे दिन मिला भोजन…

देश में कोरोनावायरस के ख’तरे को देखते हुए 14 अप्रैल तक लॉकडाउन का ऐलान किया गया। हालांकि, हजारों की संख्या में कामगार दूसरे शहरों से अपने गृह जिले में आ रहे हैं। सभी पैदल ही लंबे सफर पर निकल गए हैं। एनएच 84 के किनारे अहिराैली में स्थित बिहार पब्लिक स्कूल में क्वारैंटाइन सेंटर बना है। जहां प्रशासनिक इंतजाम काबिले तारीफ है। यहां परदेस से आने वाले 170 लोगों को ठहराया गया है। जहां खाने-पीने, नहाने-धोने व इलाज की भी मुफ्त व्यवस्था है। पैदल चलकर पहुंचे लोगों को प्रशासन ने बस द्वारा क्वारैंटाइन सेंटर तक पहुंचाया। जहां दिल को द’हला देने वाले दर्द की दास्तान सुनाते हुए कई मजदूर फफक कर रो पड़े।

एक महिला अपने बच्चों को खाना खिला रही थी। नाम था कबूतरी देवी। पूछने पर बताया कि अपने पति रामू के साथ दो अबोध बच्चों को लेकर पांच दिनों से भूखे चल रही है। वह यूपी के माेरादाबाद से आ रही है। उसके पति वहीं किसी फैक्ट्री में काम करते थे। फैक्ट्री में ही रहने का प्रबंध भी था। लेकिन, वे लॉकडाउन के कारण फैक्ट्री बंद होने से बाहर खदेड़ दिए गए। दो दिनों तक सड़क पर रहे। फिर पुलिस ने भगाना शुरू कर दिया। पैदल ही बिहार पहुंचने का मन बनाकर चल दिया। रास्ते में दो दिनों तक सत्तू वगैरह खाकर काम चलाया। लेकिन, उसके बाद पैसे खत्म हो गए। महिला ने फफकते हुए बताया कि तीन दिनों से भूखी हूं। सिर्फ पानी पिलाकर बच्चों को लेकर आई हूं। उसने बिहार की सरकार व यहां के प्रशासन को धन्यवाद दिया। ऐसी ही कहानी माेरादाबाद से आने वाली आरती देवी, राजीव सिंह, संतोष कुमार, सोहनी कुमारी, इंद्रदेव राम, जवाहर राम, जयसिंह देवी आदि की भी है।


खाना मिला तो फफक कर रो पड़े युवा 
क्वारैंटाइन सेंटर पर पहुंचे युवा सूरज, राघव व दिनेश घर जाने की जल्दी में थे। इसी के लिए वे दिल्ली से चले थे। रास्ते में उन्हें खाने पीने की बहुत कठनाईयों का सामना करना पड़ा। राघव ने बताया कि लगातार तीन दिन बिना खाने-पीने के चलता ही चला जा रहा था। इसी बीच जिले में पहुंचे तो पुलिस ने नाम-पता नोट किया। बस में बिठाकर क्वारंटीन सेंटर तक पहुंचाया। यहां जब उसे खाना मिला तो वह फफक कर रोने लगा। उसने कहा कि हम खुद नहीं चाहते हैं कि परिवार में आज ही पहुंच जाएं। हमें भी अपने घरवालों को लेकर चिंता है। हम यहीं रह लेंगे। कम से कम रहने खाने का इंतजाम तो ठीक से है। लोगों का कहना है कि अगर काम वाले जगह पर ही हमलोगों को रहने का इंतेजाम हो जाता तो क्यों अपने जान जोख्मि में डालकर पैदल अपने घर की ओर रवाना होते।

ला’ठियों से पी’ट रहे हैं मकान मालिक, भागें नहीं तो क्या करते

क्वारैंटाइन सेंटर में बैठे एक युवक ने बताया कि दिल्ली में हम जहां रहते थे। वहां रहने-खाने की कोई दि’क्कत नहीं थी। लेकिन, हमारे पास किराया देने के लिए पैसों का अभाव था। होली में गांव आये थे। सारा पैसा खत्म हो गया था। जब कंपनी वालों से कहा तो बोलते हैं जितना दिन काम किये हो उतना दिन का ही पैसा देंगे। सरकार के आदेश पर भी वेतन नहीं मिल रहा है। मकान मालिक अलग परे’शान कर रहा है। तीन महीने पहले किराए का डिमांड कर रहा है। नहीं देने पर लाठि’यों से पी’ट रहा है। ऐसे में भागते नहीं तो क्या करते।

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