कहते हैं मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसकी बानगी दिखी जमुई के गिद्धौर में। यहां के व्यास अपने दोनों पैरों को पोलियो के कारण गंवाने के बाद अपने मजबूत इरादों की बदौलत ग्रामीण इलाके में बच्चों के बीच शिक्षा का अलख जगा रहे हैं। गिद्धौर प्रखंड के सेवा गांव के रहने वाले व्यास कुमार यादव (33 वर्ष) 2006 में इकोनॉमी ऑनर्स की पढ़ाई करने के बाद शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए। 16 वर्षों से बच्चों के बीच शिक्षा का अलख जगा रहे हैं। अभी मध्य विद्यालय गिधौर में बच्चों को पढ़ाते हैं। उनके दोनों पैर डेढ़ साल की उम्र में पोलियोग्रस्त हो गए। दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बाद भी व्यास हौसला नहीं हारे, आज वह सरकारी शिक्षक हैं।
व्यास बताते हैं कि मां-बाबू जी कहते थे कि डेढ़ साल की उम्र में पोलियो का शिकार हो गया। मैं बड़ा होने लगा तो अहसास हुआ कि मैं अपने जीवन को कैसे जीऊंगा? कैसे सभालूंगा? बाबूजी ने शिक्षक बनने को प्रेरित किया। फिर मैं अपने पढ़ाई के लिए दिन रात मेहनत किया और अपने बाबू जी के सपनों को साकार करने के लिए शिक्षक बन गया। मेरे बाबूजी को चिंता थी कि मैं बैसाखी के सहारे बच्चों को कैसे पढ़ाऊंगा। आज मैं बच्चों को पढ़ा रहा हूं। बोर्ड पर लिख भी रहा हूं। पर अफसोस है कि आज बाबूजी मेरे बीच नहीं है।

व्यास की मां को सलाह मिली थी कि इसे किसी ट्रेन पर चढ़ा दो।
व्यास अपनी मां के बारे में बताते हैं कि मेरी मां दुनिया की सबसे अच्छी मां है। जो डेढ़ साल की उम्र से मुझे ढो रही है। कभी बोझ नहीं समझा। आज मैं जो भी हूं। मां बाबूजी और परिवार के लोगों के कारण।

व्यास की मां आमोला देवी।
व्यास की मां आमोला देवी बताती हैं कि गांव के लोगों और महिलाएं अक्सर कहा करते थे, यह क्या तुम्हारा सेवा करेगा। यह क्या तुम्हें कमा कर देगा। जो खुद ही बोझ है।इसे किसी एक्सप्रेस ट्रेन में चढ़ा दो, जहां जाना होगा चला जाएगा। इससे तुम्हारा पीछा छूट जाएगा। आज मेरा बेटा गांव वालों के लिए एक उदाहरण है।







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